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NIOS Class 10th Arthashastra Chapter 1. अर्थशास्त्र क्या है

NIOS Class 10th Arthashastra Chapter 1. अर्थशास्त्र क्या है

NIOS Class 10 Economics Chapter 1 What Is Arthashastra – आज हम आपको एनआईओएस कक्षा 10 अर्थशास्त्र पाठ 1 अर्थशास्त्र क्या है के प्रश्न-उत्तर (What Is Economics Question Answer) के बारे में बताने जा रहे है । जो विद्यार्थी 10th कक्षा में पढ़ रहे है उनके लिए यह प्रश्न उत्तर बहुत उपयोगी है. यहाँ एनआईओएस कक्षा 10 अर्थशास्त्र अध्याय 1 (अर्थशास्त्र क्या है) का सलूशन दिया गया है. जिसकी मदद से आप अपनी परीक्षा में अछे अंक प्राप्त कर सकते है. इसलिए आप NIOSClass 10th Economics 1 अर्थशास्त्र क्या है के प्रश्न उत्तरोंको ध्यान से पढिए ,यह आपकी परीक्षा के लिए फायदेमंद होंगे.

NIOS Class 10 Economics Chapter 1 Solution – अर्थशास्त्र क्या है

प्रश्न 1. अर्थशास्त्र दुर्लभता तथा चयन का विज्ञान है। व्याख्या कीजिये
उत्तर- प्रत्येक अर्थव्यवस्था की कुछ केन्द्रीय समस्याएं होती हैं, जो सभी अर्थव्यवस्थाओं के समक्ष आती हैं तथा
प्रत्येक अर्थव्यवस्था में इनका समाधान खोजना पड़ता है। ये समस्याएं हैं-
1. क्या उत्पादन किया जाए ?
2. कैसे उत्पादन किया जाए और ?
3. उत्पादन किसके लिए किया जाए?

ये समस्याएं अर्थव्यवस्था के किसी भी मूल मुद्दे से अलग हैं। मानवीय तथा गैर-मानवीय संसाधनों की उपलब्धता, रुचि, रीति-रिवाज, कानूनों में अंतर आदि अर्थव्यवस्था की मूलभूत समस्याएं हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को भौतिक वस्तुओं या अभौतिक सेवाओं में से एक का चुनाव करना होगा। मानव व्यवहार के उद्देश्यों, दुर्लभ संसाधनों (सीमित संसाधनों) और चयन के विज्ञान के रूप में अर्थशास्त्र
कुशलतम प्रयोग
तु वैकल्पिक समाधान प्रस्तुत करने के लिए गहनता से विचार तथा अध्ययन करता है। इस प्रकार अर्थशास्त्र का दुलर्भता और चयन का विज्ञान सीमित संसाधनों के संरक्षण के सन्दर्भ में कई विकल्प प्रस्तुत करने में सक्षम है।

प्रश्न 2. अर्थशास्त्र की धन संबंधी परिभाषा कल्याण संबंधी परिभाषा से किस प्रकार भिन्न है ?

उत्तर – अर्थशास्त्र का मूल सिद्धान्त एडम स्मिथ है। एडम स्मिथ ने कहा कि अर्थशास्त्र धन का विज्ञान है और अर्थशास्त्र के अध्ययन क्षेत्र का मुख्य उद्देश्य धन के उत्पादन और उपयोग का गहन अध्ययन करना है। यही कारण है कि क्लासिकी अर्थशास्त्रियों ने प्रारंभ में अपनी अर्थशास्त्रीय परिभाषाओं में धन को बहुत अधिक महत्व दिया. हालांकि, वे धन को केवल भौतिक वस्तुओं के रूप में स्वीकार करते थे और मानवता और समाज की कल्याण की उपेक्षा करते थे। एडम स्मिथ का विचार था कि सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और नैतिक मूल्यों की जगह केवल आर्थिक लाभ थे ।

इसलिए इन परिभाषाओं की आलोचना स्वाभाविक थी। प्रो. मार्शल ने समय परिवर्तन के साथ-साथ एडम स्मिथ की परिभाषा के दोषों से मुक्त नई परिभाषा प्रस्तुत की। उन्नीसवीं शताब्दी में कई अर्थशास्त्रियों और विद्वानों ने अर्थशास्त्र को मानव कल्याण का विज्ञान के रूप में स्वीकार किया, जिससे अर्थशास्त्र के भविष्य के विकास के लिए जनता और विद्वानों की दृष्टि बदल गई। संक्षेप में, मानव-कल्याण अर्थशास्त्र के अध्ययन का केंद्र है, जबकि धन सम्बन्धी परिभाषाओं में अर्थशास्त्र का संकुचित क्षेत्र शामिल है।

प्रश्न 3. व्यष्टि अर्थशास्त्र तथा समष्टि अर्थशास्त्र में भे
उत्तर-

व्यष्टि अर्थशास्त्र (Mirco Economic) समष्टि अर्थशास्त्र (Microeconomics)
• Micro शब्द का अर्थ है अत्यंत सूक्ष्म अर्थात व्यष्टि अर्थशास्त्र अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर अर्थशास्त्र के अध्ययन क्षेत्र को प्रस्तुत करता है। • Macro शब्द का अर्थ है बहुत बड़ा अर्थात सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था की आर्थिक क्रियाएँ समष्टि अर्थशास्त्र के अध्ययन क्षेत्र में सम्मिलित हैं।
• व्यष्टि अर्थशास्त्र की विषय-वस्तु के अन्तर्गत एक वस्तु की कीमत, एक उपभोक्ता, एक फर्म आदि के आर्थिक निर्णयों का अध्ययन होता है। • सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था का अध्ययन, जैसे- कुल उपभोग, कुल रोजगार, राष्ट्रीय आय आदि समष्टि अर्थशास्त्र की विषय-वस्तु के केन्द्र हैं।
• एक वस्तु की कीमत और व्यक्ति की आय व्यष्टि अर्थशास्त्र के उदाहरण हैं, क्योंकि इन पक्षों में केवल व्यक्तिगत निर्णय महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। • समष्टि अर्थशास्त्र का उदाहरण है – मुद्रास्फीति और

कीमत वृद्धि ।

प्रश्न 4. वास्तविक अर्थशास्त्र तथा आदर्श अर्थशास्त्र में उदाहरण देकर अन्तर स्पष्ट कीजिये ।
उत्तर- वास्तविक अर्थशास्त्र – वास्तविक अर्थशास्त्र आर्थिक क्षेत्र में होने वाली घटनाओं और “क्या है” पर केंद्रित है। या शायद अन्य पहलुओं पर गहराई से विचार करता है। संक्षेप में, वास्तविक अर्थशास्त्र आंकड़े और आर्थिक तथ्यों पर आधारित है। भारत एक कृषिप्रधान देश है और इसकी अर्थव्यवस्था तेजी से विकसित है। यह कथन भारत की वास्तविक हालत बताता है।

आदर्श अर्थशास्त्र – आदर्श अर्थशास्त्र “क्या होना चाहिए” के विषय पर केंद्रित है और आर्थिक विषयों और क्या होना चाहिए या नहीं के बारे में विचार देता है। उदाहरण के लिए, भारत की आर्थिक वृद्धि और सुधार के लिए सही आर्थिक नीतियों का निर्धारण किया जाना चाहिए और सरकार को कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए सही कार्यप्रणालियों को लागू करना चाहिए। वास्तविक और आदर्श दोनों कथनों का किसी भी आर्थिक मुद्दे पर असर दिखाई देता है। जैसे लोगों, सरकारों और कंपनियों के वित्तीय फैसले व्यक्तिगत न होकर सामूहिक होते हैं। और इसमें वास्तविक और आदर्श अर्थों का प्रभाव दिखाई देता है।

अर्थशास्त्र क्या है? के अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न

प्रश्न 1. निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर (एक वाक्य ) संक्षेप दीजिए-

(i) अर्थशास्त्र के अध्ययन क्षेत्र में संचालित आर्थिक घटनाओं और निर्णयों पर किन पहलुओं का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है ?
उत्तर – वास्तविक बनाम आदर्श अर्थशास्त्र ।

(ii) Micro तथा Macro शब्दों का क्या अर्थ है ?
उत्तर – Micro का अर्थ है – अत्यंत सूक्ष्म तथा Macro T अर्थ है – बहुत बड़ा |

(iii) दुर्लभता की परिभाषा के अनुसार “ दुर्लभ संसाधनों ” का क्या अर्थ है ?
उत्तर – दुर्लभ संसाधन वे होते हैं, जिनका निर्माण करने में बहुत लंबा समय लगता है, किंतु ये एक बार प्रयोग के बाद नष्ट हो जाते हैं; जैसे कोयला, पेट्रोल आदि ।

(iv) अर्थशास्त्र के विषय को सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र से पृथक क्यों किया गया ?
उत्तर – अर्थशास्त्र का अध्ययन क्षेत्र तथा विषय-वस्तु अत्यंत विस्तृत और विशाल हैं। इसलिए अर्थशास्त्र का एक पृथक सामाजिक विज्ञान के रूप में विकास किया गया।

प्रश्न 2. आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने अर्थशास्त्र को संवृद्धि तथा विकास के विज्ञान से सम्बोधित क्यों किया ?
उत्तर – वर्तमान अर्थशास्त्र विकास का अर्थशास्त्र कहलाता है, जिसमें देश की आर्थिक संवृद्धि और विकास के सिद्धांतों और घटकों को महत्वपूर्ण महत्व दिया जाता है। बीसवीं शताब्दी में पूरी अर्थव्यवस्था बदल गई, और अर्थशास्त्र से जुड़े गतिविधियों ने इसे प्रभावित किया। अर्थव्यवस्था की स्थिति को सुधारने के लिए संवृद्धि और विकास के ऊंचे स्तर को प्राप्त करने के लिए कई संभव प्रयास किए गए, लेकिन आज धारणीय विकास (आर्थिक विकास और संवृद्धि के साथ-साथ) का विचार भी लोकप्रिय हो गया है, जिसका एकमात्र लक्ष्य पर्यावरण को बचाना और वर्तमान और अगली पीढ़ी के हितों को बचाना है।

प्रश्न 3. वस्तु का वर्ग निर्धारण करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखा जाता है?
उत्तर – किसी वस्तु का वर्ग निर्धारण करते समय कुछ बातों का ध्यान रखा जाता है; जैसे-

1. वस्तु का मूल्य-वर्गीकृत करने में वस्तु का मूल्य महत्वपूर्ण है। इसलिए कम मूल्य वाली वस्तुओं को आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी में रखा जाता है, जबकि अधिक मूल्य वाली वस्तुओं को विलासिता की श्रेणी में रखा जाता है।

2. वस्तु की मात्रा – वस्तु की मात्रा भी वस्तु को श्रेणीबद्ध करने में मदद करती है; जैसे, 1-2 पेन एक विद्यार्थी के लिए आवश्यक हैं, लेकिन 8-10 पेन विलासिता है।

प्रश्न 4. आवश्यकताओं तथा आर्थिक क्रियाओं के मध्य संबंधों की सोदाहरण व्याख्या करें।
उत्तर – आवश्यकताओं और वित्तीय क्रियाओं में गहरा संबंध है। उदाहरण के लिए, अगर हम कपड़ा खरीदना चाहते हैं, तो हमें पैसे प्राप्त करने की कोशिश करनी होगी; पैसे को सिर्फ किसी काम को करके प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार, हमें पैसे खर्च करने की जरूरत है अगर कपड़े की जरूरत है। मानवीय क्रिया ही आवश्यकता की सन्तुष्टि कर सकती है। विभिन्न प्रकार की वस्तुओं और सेवाओं को बाजार से खरीदकर हमारी आर्थिक आवश्यकताएँ पूरी कर सकते हैं।

जैसे फैक्ट्री में काम करना, स्कूल में पढ़ाना, कपड़े और जूते बनाना आदि। मानव इन क्रियाओं को करने से अपनी ही नहीं, दूसरों की भी आवश्यकताओं को पूरा करता है। यह स्पष्ट है कि आवश्यकता पूरी करने के लिए आर्थिक कार्रवाई करनी पड़ेगी। जैसे, नमक की आवश्यकता को पूरा करने के लिए कई प्रक्रियाएं करनी पड़ती हैं। हमें इसे दुकान से खरीदना पड़ता है, जो इसे थोक विक्रेता से खरीदता है, फिर नमक बनाने वाली फर्म से। इस तरह आवश्यकताओं और आर्थिक क्रियाओं में गहरा संबंध है।

प्रश्न 5. मानवीय क्रियाओं की विस्तार से व्याख्या करें।
उत्तर- मानवीय क्रियाओं का अर्थ है उन क्रियाओं, जिनके द्वारा कोई व्यक्ति अपनी विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करता है। हम पढ़ने के माध्यम से शिक्षित होते हैं और ज्ञान प्राप्त करते हैं। इस प्रकार, मानवीय क्रियाएं किसी-न-किसी आवश्यकता की पूर्ति करती हैं। ये दो प्रकार के कार्य हैं:

(i) आर्थिक क्रियाएं – आर्थिक क्रियाएं ऐसी हैं जिनका उद्देश्य पैसा कमाने का होता है और द्रव्य के मापदंडों द्वारा मापा जा सकता है। आर्थिक क्रियाएं मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रत्यक्ष रूप से की जाने वाली क्रियाएं हैं। मजदूर मिल में काम करना, शिक्षक स्कूल में शिक्षण करना आदि आर्थिक क्रियाओं के उदाहरण हैं।

(ii) अनार्थिक क्रियाएं – अनार्थिक क्रियाएं मनुष्य की सभी क्रियाएं हैं जो धन से नहीं जुड़ी हैं, द्रव्य से नहीं मापा जा सकती हैं, मनुष्य की आवश्यकताओं से नहीं प्रेरित हैं या कोई आर्थिक उद्देश्य नहीं है। किसी स्त्री का अपने बीमार पति की सेवा करना, किसी शिक्षक का अपने बच्चे को पढ़ाना, एक साधु-संन्यासी का पूजा-अर्चना करना आदि अनार्थिक क्रियाओं के उदाहरण हैं।

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