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NIOS Class 10 Social Science Chapter 5 भारत पर ब्रिटिश शासन का

NIOS Class 10 Social Science Chapter 5 भारत पर ब्रिटिश शासन का प्रभाव

NIOS Class 10 Social Science Chapter 5 Impact of British Rule on India – Economic, Social and Cultural (1757-1857) – जो विद्यार्थी 10 में पढ़े रहे है वह सभी चाहते है की वह अच्छे अंको से पास हो .बहुत से विद्यार्थियों को Social Science के प्रश्नों उत्तरों में दिक्कत आती है .जिससे वह अच्छे अंक नहीं ले पाते .इसलिए हम आपको हमारी साईट पर NIOS कक्षा 10 के सभी Chapter के प्रश्न उत्तरों को आसन भाषा में समझाया गए है . इसलिए जो विद्यार्थी NIOS Class 10 में पढ़ रहे है ,उन्हें इस पोस्ट में NIOS Class 10 Social Science Chapter 5. Impact of British Rule on India के बारे आसन भाषा में बतया गया है ,ताकि विद्यार्थी को आसानी से समझ आ जाए .इसलिए 7th के विद्यार्थी को इस Chapter को ध्यान से पढना चाहिए ,ताकि उसे एग्जाम में अच्छे अंक प्राप्त कर सके .हमारे अतीत एनआईओएस समाधान कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान अध्याय 5 भारत पर ब्रिटिश शासन का प्रभाव नीचे दिए गया है.

प्रश्न 1. अंग्रेजों की भू-राजस्व नीतियों ने किसानों के जीवन को कैसे प्रभावित किया?
उत्तर – अंग्रेजी राज ने भारत की खेतिहर अर्थव्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया था । लेकिन यह केवल साम्राज्यवादी हितों को पूरा करने अर्थात भू-राजस्व को बढ़ाने के लिए किया गया था । जमीन की उत्पादकता बढ़ाने या मेहनतकशों को संपन्न बनाने के लिए कुछ नहीं किया गया । अंग्रेजों की भू-राजस्व नीतियों का लक्ष्य उपलब्ध संपूर्ण अतिरिक्त को चूस लेना था। किसानों को औपनिवेशिक मालिकों की मांगें पूरा करने को मजबूर किया, गया लेकिन बदले में उनको कुछ नहीं मिलता था । उस काल की विपत्तियां अंग्रेजों की भू-राजस्व नीतियों की उपज थी । इसने ग्रामीण क्षेत्रों में बहुस्तरीय भू-स्वार्थ पैदा कर दिए थे । भारतीय किसान समुदाय के सामाजिक, आर्थिक जीवन पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा ।

(i) विभिन्न प्रकार के भूमि बंदोबस्त – अंग्रेजों ने किसानों को बर्बाद करने के लिए कई भू-बंदोबस्त बनाए थे। लॉर्ड कार्नवालिस ने बंगाल और बिहार में जमींदारी बंदोबस्त लागू किया था। इसके द्वारा जमींदारों को राजस्व वसूलने का काम सौंप दिया गया और उनको उगाहे गए लगान का लगभग दसवां या ग्यारहवां भाग राज्य को देना पड़ा। लेकिन रियासत का जमींदार बाद में लगान बढ़ा सकता था। इसलिए व्यवस्था जमींदारों के हित में काम करती थी, न कि किसानों के हित में। मद्रास और बंबई (चेन्नई और मुम्बाई) महाप्रांतों के कुछ हिस्सों में रैयतवाड़ी व्यवस्था लागू की गई। इस व्यवस्था के तहत ब्रिटिश सरकार ने सीधे किसानों या रैयतों पर लगान लगाया। पर अधिकांश इलाकों में लगान बहुत अधिक था। सरकार इसे चाहे जब चाहे बढ़ा सकती थी और यदि किसान समय पर लगान नहीं देता था, तो उसे जमीन से भी निकाला जा सकता था।

(ii) खेतीहर जमीन पर बिचौलिए स्वार्थों में बढ़ोतरी – राजस्व वसूली के लिए कड़े नियम थे। समय सीमा के भीतर धन नहीं जमा करने वालों को जमीन से निकाला जाता था। इन भू-राजस्व नियमों की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वे जमीन पर बिचौलिए स्वार्थों को बढ़ाते हैं। सरकार और किसानों के बीच बिचौलिए बन गए। जमीन को किराए या उप किराए पर लेकर ये बिचौलिए लाभ उठाते थे। बंगाल प्रांत में खासतौर पर ऐसा था। भारी करों ने गरीब किसानों को परेशान किया था। दिन पर दिन हालात बिगड़ते गए। राहत देने के लिए कुछ नहीं किया गया।

(iii) खेती का व्यापारीकरण – भारत में अंग्रेजों की आर्थिक नीति का एक परिणाम यह भी था । कि औपनिवेशिक आकाओं ने व्यापारिक खेती, अर्थात फसल का उत्पादन उपभोग की बजाए बाजार के लिए करने को बहुत अधिक बढ़ावा दिया। खेती के वाणिज्यीकरण भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के परंपरागत ढांचे को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया ।

(iv) खेतिहर मजदूरों की संख्या में वृद्धि – भारतीय किसानों के एक बड़े भारी हिस्से की दशा खराब होने से खेतिहर मजदूरों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई। ग्रामीण आबादी में गरीब किसानों तथा खेत मजदूरों का बहुमत हो गया ।

(v) सूदखोरों के लिए वर्ग का उभार – चूंकि अंग्रेज सरकार राजस्व की वसूली निश्चित समय पर करती थी । अतः किसानों को अक्सर ही सूदखारों से कर्ज लेना पड़ता था । ये साहूकार किसानों से प्रायः ऊँची दरों पर ब्याज वसूल करते और गलत हिसाब, नकली दस्तखत और अँगूठा निशानी जैसी कुछ दूसरी हेराफेरी करके उनका शोषण करते थे ।

(vi) गरीबी और ग्रामीण कर्जदारी – तय समय सीमा और राजस्व की बढी दरें लागू करके अंग्रेजी राज अपने साथ किसानों के जीवन में दरिद्रता और गरीबी भी लाया था। किसानों का विशाल बहुमत सूदखोरों के कर्ज में डूबा रहता था। अंग्रेजों द्वारा भारी शोषण किये जाने के कारण ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा घोर निर्धनता के गर्त में रहता था । उनकी दुर्दशा का एक अन्य कारण गैर-कानूनी दोहन तथा जमींदारों के अत्याचार थे ।

प्रश्न 2. स्थायी बंदोबस्त और महालवारी बंदोबस्त के बीच भेद बताएं।
उत्तर – स्थायी बंदोबस्त – स्थायी व्यवस्था में लगान की मात्रा पूरी तरह से निर्धारित की गई थी। अब फसल कम या अधिक होने पर या उनके पारिश्रमिक से लगान कम या अधिक नहीं हो सकता था। जमींदार भूमि का स्थायी स्वामित्व रखते थे। लगान कृषकों और जमींदारों को देने के बजाय पट्टों पर रखा गया। सर्वोच्च न्यायालय को ही इसे कम करने या बढ़ाने का अधिकार था। किसानों या जमींदारों से जो लगान देने में असमर्थ थे, उनकी जमीन छीन ली जाती थी। जमींदार स्वेच्छा से जमीन खरीद या बेच नहीं सकते थे।

महालवारी बंदोबस्त – महालवारी व्यवस्था के अनुसार, प्रत्येक गांव में जमींदारों या उन परिवारों के मुखियाओं से लगान निर्धारित किया गया था, जो उस समय लगान वसूल कर रहे थे। प्रारंभ में, कम्पनी का हिस्सा लगान राशि में से कुल किराए आय का 85 प्रतिशत था। इसमें बार-बार बदलाव किए गए, और 1833 में विनियम IX के अनुसार लगान को 66% कर दिया गया। 1855 के सहारनपुर नियम के अनुसार इसे और घटाकर पचास प्रतिशत कर दिया गया। कुल मिलाकर, इसमें ग्राम समुदाय को एक भू-स्वामी और वित्तीय इकाई माना गया था। प्रत्येक खेत पर इसके बावजूद भी कर लगाया जा सकता था। पूरे गाँव में हर किसान का राजस्व बकाया रहने पर सभी जमीन नीलाम कर दी जाती थी। मुख्य न्यायाधीशों और माल विभाग के अधिकारियों ने इन जमीन को खरीदकर जमींदार का दर्जा प्राप्त किया।

प्रश्न 3. अंग्रेजी शिक्षा ने भारत में राष्ट्रवाद की वृद्धि में कैसे योगदान दिया?
उत्तर – अंग्रेजों ने अपनी राजनीतिक, प्रशासनिक तथा आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यहाँ अंग्रेजी भाषा का प्रयोग प्रारंभ किया । यह मुख्यतः प्रशासनिक कार्यों के लिए क्लर्क, एजेण्ट तथा अन्य अधीनस्थ स्टाफ की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया गया। वे यह भी सोचते थे कि अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीय अंग्रजों के प्रति वफादार रहेंगे और पश्चिमी आदतें तथा रुचियां जाग्रत करेंगे और विदेशी वस्तुएं खरीदेंगे, जिससे अंग्रेजों के आर्थिक हितों की पूर्ति होगी । श्रेष्ठता के दंभ से भरे इंग्लैण्ड में कुछ दूसरे लोग यह अनुभव करते थे कि अंग्रजी माध्यम से पश्चिमी शिक्षा पिछड़े भारतीयों को सभ्य बनाएगी । लेकिन अंग्रेजी भाषा को भारत में प्रारंभ करने का परिणाम उनकी अपेक्षाओं से बिल्कुल विपरीत था । इसमें पश्चिम के बुद्धिवाद तथा समानता के नये विचार आए । एक बार शिक्षित होने पर भारतीयों ने अमेरिका तथा फ्रांस की क्रांति, जर्मन तथा इटली के एकीकरण तथा तानाशाही शासन को उखाड़ फेंकने के लिए लोगों ने अधिकारों के बारे में भी अध्ययन किया । स्वतंत्रता, बंधुत्व तथा समानता जैसे आदर्शों ने उन्हें कार्यवाही करने की प्रेरणा दी। इसके अतिरिक्त अंग्रेजी शिक्षा ने भारतीयों को पश्चिम के महान चिन्तकों और दार्शनिकों जैसे मिल, बेन्थम, बर्क, रूसो, थामस पेन आदि की रचनाओं से परिचित कराया ।

प्रश्न 4. देश में अंग्रेजी भाषा की सफलता के लिए कारणों की जांच करें।
उत्तर – जब अंग्रेजों ने प्रशासन हासिल किया, तो उन्होंने अपने क्षेत्र में समान कानून लागू किए। एक समान प्रशासनिक ढांचा बनाया। रेल चलाने और बेहतर डाक और तार बनाने से भारतीय एक-दूसरे के निकट आए। 1844 में अंग्रेजी राजभाषा बन गई, जो अंततः सभी क्षेत्रों के शिक्षित लोगों को एकजुट करने वाली राष्ट्रभाषा बन गई. यह मत समझो कि अंग्रेजों ने यह सब भारतीयों के हित में किया था। वास्तव में, वे साम्राज्यवादी हितों के लिए शुरू किए गए थे। लेकिन शीघ्र ही ये भारतीयों के लिए वरदान बन गए । Британी सरकार और उसके कानूनों से एक नया वर्ग पैदा हुआ, जिसमें डॉक्टर, वकील, अध्यापक, सरकारी कर्मचारी, इंजीनियर, व्यापारी और अन्य शामिल थे । शिक्षित होने के कारण वे ब्रिटिश शासन की असली रूपरेखा जानते थे और ब्रिटिश नीतियों का दृढ़ आलोचक बन गए थे । ये लोग भारतीय आन्दोलन में मार्गदर्शक बन गए।
बहुत से विदेशियों ने हमारी भारतीय भाषाओं, साहित्य और संस्कृति में रुचि को पुनर्जीवित करने में सहायता की है। विलियम जोन्स ने एशियाटिक सोसायटी की स्थापना प्राचीन भारत के इतिहास, पुरावशेषों, कला, विज्ञान और साहित्य की खोज के लिए की। जेम्स प्रिंसेप जैसे दूसरे विदेशी विद्वान् ने कहा कि इसने भारतीयों को अपने धर्म और संस्कृति की जांच करने और अपनी राष्ट्रीय भावना विकसित करने में आवश्यक शक्ति और गतिशीलता दी। भारत पर आक्रमण करने वाले अंग्रेजों ने गोरे लोगों के खिलाफ जातीय द्वेष की नीति लागू की। क्योंकि वे रंग-रूप में अधिक काले थे, भारतीयों को घृणा और तिरस्कार से देखा जाता था । भारतीयों को उनके देश में दूसरी श्रेणी का नागरिक माना जाता था। केवल अंग्रेजों के लिए क्लब, ट्रेन, पार्क और अस्पताल अलग से बनाए गए थे। इस व्यवहार से गुस्सा और अपमान हुआ, जो ब्रिटिश-विरोधी भावना को जन्म देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया।

भारत पर ब्रिटिश शासन का प्रभाव के अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न

प्रश्न 1. प्लासी का युद्ध क्यों हुआ ? उसने बंगाल के इतिहास को किस तरह बदल दिया ?
उत्तर –मुगल साम्राज्य का पतन होने के बाद, अंग्रेजों की सत्ता भारत में तीन जगह फैलने लगी। मद्रास, मुंबई और कलकत्ता ये केंद्र थे । 1800 के मध्य तक, अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों को कर्नाटक में हराया। फ्रांसीसी भी साम्राज्यवादी थे। फ्रांसीसी लोगों के व्यापारिक और क्षेत्रीय लक्ष्यों को धोखा दिया गया। वे अब बंगाल गए। यहाँ रॉबर्ट क्लाइव और इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अन्य अधिकारियों ने लोकप्रिय नवाब सिराजुद्दौला के खिलाफ साजिशें रचीं। जनरल मीर जाफर ने नवाब प्लासी की लड़ाई में उसे हराया। यही कारण है कि अंग्रेजों की जीत को भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में देखा जाता है, न कि उनकी असली सैनिक शक्ति। यहीं से ब्रिटिशों की भारतीय राजनीति पर पकड़ बढ़ी। इससे अंग्रेजों ने बंगाल पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली, जो उनके उत्साह को आगे के क्षेत्रीय युद्धों के लिए बढ़ा। सिराजुद्दौला की पराजय और मृत्यु के साथ, अंग्रेजों की वास्तव में, वे अधिकारी बन गए। नवाब मीर जाफर ने अंग्रेजों को राजनीतिक और आर्थिक दोनों क्षेत्रों में कई रियायतें दीं। कलकत्ता सहित चौबीस परगना अंग्रेजों के पास थीं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि नवाब को किसी भी आक्रमण से बचने के लिए अंग्रेजों की सैनिक सहायता पूरी तरह से चाहिए थी। एक महत्वपूर्ण घटक बन गया।

प्रश्न 2. भारतीय जनमानस पर नई शासन और न्यायिक व्यवस्था का किस तरह असर पड़ा ?
उत्तर – भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना से देश भर में असंतोष और अराजकता फैल गई। अंग्रेजों की जीत और भारतीय राज्यों को हड़पने से न केवल शासक राजघरानों की तबाही हुई, बल्कि इन राजघरानों पर आश्रित लोगों पर भी बुरा प्रभाव पड़ा। राजाओं और सामंतों पर निर्भर अभिजात्य वर्ग, दस्तकार और कामगार भी विलुप्त हो गए। भारतीयों में नए अंग्रेज प्रशासन ने एक प्रकार का डर पैदा किया। नई व्यवस्था ने भारतियों पर निम्नलिखित प्रभाव डाला:

(i) परंपरागत बुद्धिजीवियों की अवनति – भारत में ब्रिटिश राज के मजबूत होने से धार्मिक गुरुओं, उपदेशकों और अन्य कार्यकर्त्ताओं की स्थिति खराब होने लगी। जब अंग्रेजों ने उनके पूर्ववर्तियों और पुराने राज्यों को नष्ट कर दिया, अभिजात्य वर्गों में से अधिकांश को बहुत बुरा संघर्ष करना पड़ा, जिससे वे अंग्रेजी राज और जीवन शैली का कट्टर दुश्मन बन गए।

(ii) नये मध्यम वर्ग का उदय – भारतीय समाज में नवोदित मध्यम वर्ग का उदय एक बड़ा बदलाव था। यह सबसे अधिक बंगाल, बंबई और मद्रास के तीन महाप्रांतों में दिखाई दिया। भारतीय जनता के एक छोटे से हिस्से को अंग्रेजों के व्यावसायिक हितों में बढ़ोत्तरी से नये अवसर मिल गये। उनमें से कई ने अंग्रेज व्यापारियों के एजेंटों और बिचौलियों के रूप में काम किया और अच्छी कमाई की। इसी प्रकार बंगाल का प्रसिद्ध बाबू वर्ग पैदा हुआ। भू-अभिजात्य वर्ग भी इस नए वर्ग का हिस्सा बन गया। अंग्रेजों ने इस तरह नए भूस्वामियों के साथ-साथ व्यावसायिक तथा नौकरी पेशा मध्यम वर्ग भी बनाया।

(iii) पश्चिमी शिक्षा और आधुनिक विचारधारा का प्रसार – ईसाई मिशनरियों ने भारतीयों के बीच पश्चिमी शिक्षा का प्रसार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन उनका मुख्य उद्देश्य ईसाई धर्म का प्रचार करना था। पर भारतीयों के व्यक्तिगत और सामूहिक प्रयासों से कई स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना हुई | उनका मानना था कि अंग्रेजी सीखना बहुत जरूरी था। भारतीयों को उच्च शिक्षा देने के लिए कलकत्ता, मद्रास और बंबई में विश्वविद्यालय खोले गए। इस तरह नवीन विचारों और धारणाओं ने भारतीय मनों पर प्रभाव डालना शुरू कर दिया। भारत पर अंग्रेजों का शासन और पश्चिमी शिक्षा का प्रसार होने से यूरोपीय विचार भी भारतीय समाज में आने लगे । इससे भारतीयों में अंग्रेजी साम्राज्यवाद के शोषण का एहसास हुआ। इससे शिक्षित भारतीयों पर बुद्धिवाद, उपयोगितावाद, गणतंत्रवाद, मानवतावाद और प्रभुसत्तावाद जैसे विचारों का बड़ा प्रभाव पड़ा । इन पश्चिमी विचारों ने उनकी आलोचनात्मक दृष्टि से अपने समाज को देखने में मदद की। वे भी अंग्रेजी साम्राज्य की शोषणकारी भूमिका जानते थे। अंग्रेजी शासन ने भारत में धार्मिक और सामाजिक सुधारों को भी बढ़ावा दिया। कई समाज-सुधारकों ने अंग्रेजों से मिलकर विधवा कानून, मानव बलि और भ्रूण हत्या पर रोक लगाने और सती प्रथा को खत्म करने के लिए काम किया। वहीं, अंग्रेजी राजाओं ने विभिन्न जातियों की धार्मिक बुराइयों के खिलाफ अभियानों का भी समर्थन किया। भारत में ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज और आर्य समाज ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ कई सामाजिक-धार्मिक आंदोलन शुरू किए ।

(iv) नए प्रशासन का प्रारंभ – भारतीयों को अंग्रेजों द्वारा लागू की गई प्रशासन की उस नई व्यवस्था को अपनाने में मुश्किल हुई। भारतीयों को अंग्रेज अफसरों ने हेय मान लिया था। साथ ही आम लोगों को उन तक पहुँच भी मुश्किल थी। न्यायालयों को अलग-अलग स्थानों पर बनाया गया था। कुछ विशिष्ट लोगों ने शासन को नियंत्रित किया था। इसलिए नया प्रशासन व्यक्तिगत नहीं था। लोग इसके खिलाफ थे। इसके अलावा, अंग्रेजों का प्रशासन मूलतः भ्रष्ट और नस्लवादी था। यह भारतीयों को कोई राजनीतिक अधिकार नहीं देता था। भारतीयों को अंग्रेजों ने किसी भी महत्वपूर्ण नागरिक या सैनिक पद पर बैठने नहीं दिया।

(v) नई न्यायिक व्यवस्था की आधारशिला – भारत में अंग्रेजों ने नए कानून और न्याय भी बनाए। कानूनों को संहिताबद्ध किया गया और दीवानी और फौजदारी अदालतों की व्यवस्था की गई। साथ ही न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने की कोशिश की गई थी। भारत में ‘कानून के राज’ कायम करने का प्रयास हुआ। लेकिन इससे केवल अंग्रेजों को फायदा हुआ। भारतीयों के पास भी मनमानी ताकतें आईं और गईं। अधिकारों और स्वाधीनता पर हस्तक्षेप करने का अधिकार

प्रश्न 3. 1857 के आन्दोलन के मुख्य कारण क्या थे?
उत्तर – सन 1857 का आन्दोलन – भारत में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध यह एक पहला व्यापक आंदोलन था। इसने कम्पनी सरकार की नींव हिलाकर रख दी। सन 1857 के विद्रोह के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे –

(i) राजनीतिक कारण – देशी राज्यों को अपने राज्य में मिलाने की नीति, गर्वनर जनरल लॉर्ड डलहौजी द्वारा चूक के सिद्धान्त को मनमाने ढंग से लागू करना और राजाओं एवं सामंतों की पेंशन, उपाधियों को समाप्त करने जैसे कारणों के साथ अवध पर अंग्रेजों के कब्जे ने आग में घी डालने का काम किया ।

(ii) सामाजिक-धार्मिक कारण – कंपनी सरकार के कुछ कामों को भारतीयों द्वारा उनके सामाजिक धार्मिक रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप माना जाता था। ईसाई मिशनरियों की धर्मांतरण की गतिविधियों, सती प्रथाके उन्मूलन और विधवा विवाह के पक्ष में कानून (1856), धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बने । भारतीयों के नागरिक अधिकारों की सुरक्षा ।, धार्मिक अयोग्यता अधिनियम पश्चिमी शिक्षा के प्रारंभ, मंदिरों, मस्जिदों तथा अन्य रूढ़िवादी एवं परम्परावादी तत्त्वों के बहुत बड़े हिस्से को नाराज कर दिया था । विदेशी शासन के अधीन भारत की परंपरागत समाज व्यवस्था, संस्कृति और धर्म को खतरा लगने लगा था । हिन्दू और मुसलमान दोनों ही यह पक्के तौर पर मानते जा रहे थे कि अंग्रेज भारत की समूची आबादी को ईसाई बनाने में लगे है ।

(iii) आर्थिक और प्रशासनिक कारण- अंग्रेजों की आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों ने देशी राजघरानों, उनके आश्रितों, परंपरागत जमींदारों, ताल्लुकदारों, किसानों, कारीगरों और दस्तकारों अर्थात सबको प्रभावित किया था । नागरिक और सैनिक सभी ऊँचे पद यूरोपियनों के लिए आरक्षित थे । इसके साथ साथ कंपनी का प्रशासन तंत्र और उसकी न्यायिक व्यवस्था अयोग्य, भ्रष्ट और अत्याचारी प्रतीत होती थी । नस्ल के आधार पर खुलेआम भेदभाव होता था । भारतीय सत्ता तथा उच्च पदों से वंचित थे । असंतोष अंग्रेजों की आर्थिक

(iv) सैनिक कारण- कंपनी की सेना में सेवारत भारतीय सैनिकों में व्यापक असंतोष था। उन्हें कई चुनौतीओं का सामना करना पड़ा। जब अंग्रेज अधिकारियों को समुद्र पार के क्षेत्रों में उनकी जरूरत होती थी, तो उन्हें समुद्र पार (कालापानी) जाना पड़ा। लेकिन तब भारत में समुद्र पार करना अशुभ माना जाता था। कम वेतन और शोषण की नीति से सिपाही नाराज थे। भी बहुत कम तरक्की के अवसरों को लेकर थी। उन्हें भेदभाव और दुर्व्यवहार भी हुआ था। उन्हें एक नई राइफल, रॉयल एंफील्ड, दी गई, जिससे उनका असंतोष बढ़ गया। गाय और सूअर की चर्बी उनके सिरों पर लगी होने की बात कही गई। भारतीय सैनिकों ने उनका उपयोग करने से इनकार कर दिया क्योंकि वे अपनी जाति और श्रद्धा को खो देंगे। इन कारतूसों ने हिंदूओं और मुसलमानों को उत्तेजित कर दिया। इस तरह के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक प्रशासनिक और सैनिक कारणों ने 1857 के विद्रोह की शुरुआत की थी । यह निश्चित रूप से भारतीय सैनिकों ने शुरू किया था, लेकिन यह जल्दी ही एक बड़े जन आंदोलन में बदल गया, जिसमें असैनिक लोगों ने भी खुलकर भाग लिया।

प्रश्न 4. सन 1857 का आंदोलन अंततः विफल क्यों हुआ ?

उत्तर – हालाँकि, प्रथम स्वाधीनता संग्राम के नाम से भी जाना जाता है 1857 के विद्रोह। इसमें लगभग पूरे भारत ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया था। 1857 का महान आंदोलन लंबे समय तक सफल नहीं हो सका। अंततः आंदोलन को अंग्रेजों और गोरों ने कुचल दिया। लेकिन यह मुश्किल नहीं था। शीघ्र ही अंग्रेजों ने दिल्ली, कानपुर, ग्वालियर और अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर कब्जा कर लिया। झांसी की रानी अंग्रेजों से लड़ते हुए वीरोचित मर गई। मौलवी अहमतुल्ला और कुंवर सिंह भी इसी तरह मर गए। नाना साहेब, पूर्व पेशवा द्वितीय का पुत्र, कई पराजयों के बाद नेपाल भाग गए। तांत्या टोपे को अपमान हुआ। उसे पकड़कर फांसी दे दी गई। बहादुरशाह द्वितीय को अंग्रेजों के सामने झुकना पड़ा और रंगून भेजा गया, जहाँ वह मर गया। विजयी अंग्रेज सैनिकों ने अमानवीय व्यवहार किया। आंदोलनकारियों को देश से बाहर निकाल दिया गया और खुलेआम फांसी पर लटका दिया गया। आंदोलन का केंद्र रहा गांव पूरी तरह से नष्ट हो गया। अंग्रेजों ने आतंक की नई शुरुआत की।

प्रश्न 5. अंग्रेजों के खिलाफ हुए आरंभिक विद्रोहों का संक्षिप्त विवरण दीजिए ।
उत्तर – अंग्रेजी राज के दौरान फैली अव्यवस्था ने भारतीय जनता पर प्रतिकूल प्रभाव डाला, जिसके परिणामस्वरूप उनमें व्यापक स्तर में असंतोष फैल गया भिन्न तथा उन्होंने भिन्न स्थानों पर अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया । अंग्रेजों के खिलाफ किए गए प्रमुख विद्रोहों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-

1. बंगाल के संन्यासी और फकीर विद्रोह – बंगाल में महा अकाल के पहले और बाद में अंग्रेजी राज के विरुद्ध हिंदू संन्यासियों विद्रोह किया था । इस उभार के पीछे तात्कालिक कारण यह था कि अंग्रेजों ने मंदिरों तथा अन्य पवित्र स्थलों के तीर्थयात्रियों पर प्रतिबंध लगा दिए थे । जनसाधारण के सहयोग से इन संन्यासियों ने अंग्रेजों के कारखानों तथा उनकी बस्तियों पर धावा बोल दिया । उन्होंने भारी मात्रा में चंदा भी एकत्र किया। इन तमाम बातों से बहुत-से मुस्लिम फकीरों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर दी। इनका नेतृत्व मजनू शाह और चिराग अली ने किया। उन्होंने अंग्रेजों के कारखानों पर हमलेका प्रभाव : आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक ( 1757-1857 ) । 49 किए और उनके सामान, हथियारों तथा रुपए-पैसे को लूट लिया । फकीरों और अंग्रेजों के बीच कई लड़ाइयां हुई जिनमें अंग्रेजों को भारी नुकसान उठाना पड़ा । इन संन्यासियों और फकीरों को बड़ी मुश्किल से 19वीं सदी के प्रारंभ में ठंडा किया जा सका ।

2. बहावी आंदोलन – यह आंदोलन इस्लामिक समाज और धर्म को सुधारने का था। उसने मुसलमानों को शुद्ध करने का प्रयास किया, उन गैर-इस्लामी व्यवहारों को खत्म करके। रायबरेली के सैयद अहमद ने भारत में इस आंदोलन को जन्म दिया था। लेकिन उनका असली लक्ष्य था हिन्दुस्तान में मुस्लिम राज की स्थापना करके पंजाब और बंगाल में सिक्खों और अंग्रेजों की सत्ता को समाप्त करना। बहावीवाद तेजी से बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश और उत्तर-पश्चिम भारत में फैल गया। सैयद अहमद सिखों के खिलाफ बालाकोट की लड़ाई में मारा गया। इसके बाद पटना आंदोलन का मुख्यालय बन गया। सैयद निसार अहमद (टिटू मीर) बंगाल में अंग्रेज-विरोधी संघर्ष का नेतृत्व करता था, जो कभी-कभी सांप्रदायिक मोड़ भी लेता था। बहावी विद्रोह में कुछ सांप्रदायिक और पुनरुत्थानवादी विचारधारा भी थी, लेकिन इसकी मुख्य प्रेरणा साम्रज्यवाद से थी। अंग्रेजों ने इसके खिलाफ कठोर कदम उठाए, जो अंततः इसे खत्म कर दिया।

3. पंजाब का कूका आंदोलन – भगत जवाहर म्हाल ने इसका उद्घाटन किया था। मुख्य लक्ष्य था सिक्ख धर्म को बुराइयों, अंधविश्वासों और कुरीतियों से मुक्त करना। लेकिन पंजाब को अंग्रेजों द्वारा हड़प लिए जाने के बाद, कूकाओं का मुख्य लक्ष्य सिक्खों की सत्ता का पुनर्निर्माण करना था और उन पर नियंत्रण करना था। यह अंग्रेज अधिकारियों को बहुत चिंतित करता था। उन्होंने कूकाओं को दबाने के लिए कई बार प्रयास किए।

4. संथाल विद्रोह – संथाल विद्रोह पर आदिवासी आक्रोश तथा अंग्रेज विरोध भावनाओं की छाप थी। सिद्धू और कान्हू के नेतृत्व में हजारों संथालों ने अत्याचारी अंग्रेजों और उनके स्थानीय सहयोगियों के विरुद्ध बगावत की । संथालों ने भूस्वामियों, सूदखोरों, बगान मालिकों और अंग्रेज अफसरों के मकानों पर हमले किए और उनको नष्ट कर दिया | निचले स्तर के दूसरे लोग भी उनके साथ हो गए । उन्होंने अंग्रेजी राज की सामप्ति की घोषणा कर दी । शुरू-शुरू में अनेक विफलताओं के बाद भी अंग्रेजों ने सेना के बल पर संथाल विद्रोह का अंत कर दिया ।

5. फरायजी आंदोलन – पूर्वी बंगाल के फरीदपुर में रहने वाले हाजी शरीयतउल्ला ने इस आंदोलन की नींव रखी थी । मुख्य उद्देश्य था मुस्लिम समाज से गैर-इस्लामी आदतों को दूर करना और भारत से अंग्रेजों, या ईसाइयों, को बाहर निकालकर एक बार फिर मुस्लिम राज की स्थापना करना। इसलिए इस आंदोलन की राजनीति धार्मिक थी। दादू मियां और वोवा मियां ने मध्य और पूर्वी बंगाल के मुस्लिम किसानों को हिंदू जमींदारों, साहूकारों और नील बगानों के मालिकों (अंग्रेजों) के खिलाफ सफलतापूर्वक एकजुट किया। उन्नीसवीं सदी के छठे दशक में बंगाल सरकार ने अंततः गिरफ्तारियों, मुकदमों और सजाओं का सिलसिला चलाया।

प्रश्न 6. अंग्रेजों तथा मैसूर शासकों के मध्य लड़ी गई लड़ाइयों का संक्षिप्त विवरण दीजिए ।
उत्तर- अंग्रेजों ने बंगाल पर सफलतापूर्वक शासन किया था। लेकिन अंग्रेजी राज को पूरे भारत पर स्थापित करना आसान नहीं था। अंग्रेजों के प्रभाव को बढ़ाने की कोशिशों को रोकने के लिए कई स्थानीय ताकतों ने उनका विरोध किया। मराठा और मैसूर के शासक इनमें सबसे महत्वपूर्ण थे। मैसूर, 1800 के उत्तरार्द्ध में हैदर अली और उसके बेटे टीपू सुलतान के नेतृत्व में एक शक्तिशाली राज्य बन गया। हैदर अली ने अंग्रेजों को अपना घोर दुश्मन समझा। वह चाहता था कि वे कर्नाटक से भाग जाएँ। लेकिन हैदराबाद के निजाम और मराठों ने अंग्रेजों से मित्रता की थी । हैदर के इन सहयोगियों को अलग-थलग करने के बाद अंग्रेजों को हैदर के साथ समझौता करना पड़ा. इससे मैसूर और अंग्रेजों की पहली लड़ाई का अंत हुआ, जिसमें विभाजित क्षेत्रों की वापसी हुई।
इसके लगभग ग्यारह वर्ष बाद अंग्रेजों और मैसूर के बीच दूसरा युद्ध शुरू हुआ। हैदरअली को शुरू में कुछ सफलताएं मिलीं, लेकिन अंग्रेजों ने बड़ी जीतें हासिल कीं। हैदरअली की अचानक मौत इन्हीं परिस्थितियों में हुई। उसके बेटे टीपू सुल्तान ने भी अपने पिता का काम किया। इस युद्ध में भी कोई पक्ष पराजित नहीं हुआ और इसका अंत मंगलौर संधि से हुआ। इस समझौते के अनुसार, दोनों पक्षों ने जीते हुए भूभाग एक दूसरे को लौटाने पर सहमति की थी। मैसूर युद्ध, इन दो असफल युद्धों के बीच हुआ था। इस बीच, अंग्रेजों ने टीपू की राजधानी को घेर लिया और निजाम और मराठों के साथ संधि करके श्रीरंगपट्टम की संधि करने पर मजबूर किया। इसकी शर्तों के अनुसार टीपू को अपनी लगभग आधी सेना उनको देनी पड़ी थी। उसने युद्ध के लिए आठ करोड़ रुपये का भुगतान किया और अपने दो बेटों को बंधक के रूप में कलकत्ता भेजना पड़ा।
टीपू ने अपनी हार का बदला लेने के लिए अंग्रेजों के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय विद्रोह बनाने की कोशिश की। उसने फ्रांस, तुर्की, अफगानिस्तान और फारस के मुस्लिम शासकों से सहायता मांगी। पर उसके प्रयत्न असफल रहे। टीपू सुलतान ने मैसूर और अंग्रेजों के बीच हुई चौथी लड़ाई में पराजय भोगी।

प्रश्न 7. स्थायी बंदोबस्त के मुख्य कारण, विशेषताएं तथा दोष क्या थे?
उत्तर- कार्नवालिस ने अन्य प्रशासनिक सुधार कार्यों के साथ बंगाल में स्थायी प्रबंध स्थापित करके भूमि संबंधी दोषों को दूर करना चाहा। उसके समक्ष दो प्रमुख समस्याएं थीं-
1. उचित व्यवस्था के लिए किसके साथ समझौता करे, जमींदारों से अथवा किसानों से ?
2. वह कैसे इस प्रकार का प्रबंध करे कि वह स्थायी रहे तथा जिसे बार-बार परिवर्तित न किया जाए?
वास्तव में, स्थायी भूमि-प्रबंध सरकार और जमींदारों के बीच एक समझौता था जिसके अनुसार जमींदार एक निश्चित भूमि का मालिक बन गए, शर्त पर कि वे जितना भूमि कर देंगे, उसे अंग्रेजों को प्रतिवर्ष एक निश्चित भााग लगान के रूप में देंगे। स्थायी योजना में लगान की मात्रा पूरी तरह से निर्धारित की गई। अब फसल कम या अधिक होने पर या उनके पारिश्रमिक से लगान कम या अधिक नहीं हो सकता था। जमींदार भूमि का स्थायी स्वामित्व रखते थे। लगान कृषकों और जमींदारों को देने के बजाय पट्टों पर रखा गया। सर्वोच्च न्यायालय को ही इसे कम करने या बढ़ाने का अधिकार था। किसानों या जमींदारों से जो लगान देने में असमर्थ थे, उनकी जमीन छीन ली जाती थी। जमींदार चाहें तो अपनी जमीन बेच या खरीद सकते थे। स्थायी प्रबंध का मुख्य लक्ष्य बंगाल में पूरी तरह से राजभक्त जमींदार बनाना था, और इस लक्ष्य को पूरा करने में बहुत सफलता मिली।

स्थायी प्रबंध से लाभ – स्थायी प्रबंध में कम्पनी, जमींदार तथा किसान सभी को लाभ प्राप्त हुआ, जिन्हें निम्न प्रकार से वर्णित किया जा सकता है-

1. सरकार के कार्यों की सराहना स्थायी बंदोबस्त के कारण सरकार की लोकप्रियता बढ़ गई। जमींदारों तथा धनिक वर्ग के किसानों ने सरकार के कार्यों की सराहना की।
2. बंगाल पर प्रभाव – स्थायी बंदोबस्त ने बंगाल को भारत का सबसे धनी प्रान्त बना दिया।
3. लगान वसूली में सुविधा – अब कम्पनी को लगान वसूल करने वाले की जरूरत नहीं थी, क्योंकि जमींदार स्वयं ही कम्पनी के खजाने में लगान जमा करा देते थे।
4. जमींदारों के प्रभाव में वृद्धि – कृषि के उन्नति के परिणामस्वरूप जमींदारों के प्रभाव में वृद्धि होती चली गई ।
5. लाभ प्राप्ति के लिए कृषि पर ध्यान – भूमि के स्थायी स्वामी बनकर वे ज्यादा लाभ कमाने की इच्छा से कृषि की ओर ध्यान देने लगे।
6. झगड़ों की समाप्ति – इस व्यवस्था से भूमि के उत्तराधिकारी के लिए जो संघर्ष हो रहे थे, भूमि के स्थायी रूप में प्राप्त होने के साथ ही साथ वे समस्त झगड़े भी समाप्त हो गए ।
7. कृषि के क्षेत्र में वृद्धि – जमींदारों ने लाभ की अधिकताकारण बंजर भूमि को साफ करके कृषि के क्षेत्र में वृद्धि की तथा वनों को भी साफ करके कृषि के योग्य बनाया जाने लगा।
8. शासन में कुशलता – कम्पनी के कर्मचारी जब दूसरा कार्य नहीं कर पाते थे, जिसके कारण शासन में कुशलता का
संचार होने लगा।
9. सरकार को सहयोग – इस व्यवस्था के प्रबंध से जमींदार पूर्णरूप से संतुष्ट थे तथा अब वे सरकार के शुभ-चिन्तक बन गए थे। उन्होंने संगठित रूप से सरकार की सेवा की।

स्थायी प्रबंध के दोष – स्थायी प्रबंध में अनेक दोष थे, जिनका वर्णन इस प्रकार है-

1. शहर में रहने वाले जमींदार इतने धनी हो गए कि उन्होंने ठेकेदारों को अपनी जमीन दे दी, जिससे ठेकेदारों और जमींदारों के बीच एक दीवार बन गई। किसानों और जमींदारों के हितों को नुकसान हुआ क्योंकि इससे उनका सीधा संपर्क समाप्त हो गया।

2. किसानों पर प्राकृतिक प्रकोप का प्रभाव – अकाल आदि जैसी दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में किसान के प्रति लगान उगाहने के संबंध में उदारता नहीं दिखाई गई। इससे स्थायी बंदोबस्त के बाद ही बंगाल में भीषण अकाल पड़ा तथा लाखों व्यक्ति मारे गए।

3. किसानों पर अत्याचार – जमींदार किसानों पर मनचाहा अत्याचार करते थे ।

4. अधिक लगान की संभावना का अभाव – ज्यादा उपज के परिणामस्वरूप कम्पनी को कभी भी ज्यादा लगान नहीं मिल सकता था, क्योंकि लगान स्थायी रूप से आगामी दस वर्षों के लिए निश्चित कर दिया गया था। यदि भूमि की उपज ज्यादा होती थी, तब भी सरकार को उतना ही लगान प्राप्त होना था।

प्रश्न 8. उपनिवेश में कृषि का व्यवसायीकरण एक जबरदस्ती / जबरन प्रणाली किस प्रकार थी?
उत्तर- भारत में अंग्रेजों ने विभिन्न राजस्व नीतियों को अपनाकर अधिक राजस्व वसूल करने की कोशिश की। उसकी सभी राजस्व एवं व्यापारिक नीतियों का उद्देश्य था भारतीय धन को इकट्ठा करना और उसे अपने फायदे के लिए प्रयोग करना, जिसके लिए उन्होंने सभी उपायों को अपनाया। इसलिए अंग्रेजों ने भारत में कृषि को व्यवसाय बनाया। इंग्लैंड में हुई औद्योगिक क्रान्ति ने देश के उद्योगों को काफी बढ़ावा दिया। लेकिन उन्होंने भारत में कृषि के व्यवसायीकरण को शुरू किया, क्योंकि इंग्लैंड के उद्योगों को कच्चे माल की जरूरत थी। इस व्यवसायीकरण का उद्देश्य था इंग्लैंड के उद्योगों को कच्चा माल प्रदान करना, जो भारत को कच्चे माल के स्रोत के रूप में स्थापित करके इस पर बड़ी आसानी से कब्जा कर लिया था। 1850 तक भारत में खाद्य पदार्थों की खेती होती थी जो मुख्य रूप से भारतीय लोगों को चाहिए थे। लेकिन अंग्रेजों द्वारा व्यवसायीकरण की नीति अपनाने से इस प्रवृत्ति में बदलाव आने लगा।

ब्रिटेन के उद्योगों में कच्चे माल के रूप में उपयोग की जा सकने वाली वस्तुओं के उत्पादन को बाद में अंग्रेजी सरकार ने अनुमति दी। उन्हें खाद्य फसलों के स्थान पर नकदी और कच्चे माल पर आधारित फसलों का उत्पादन करने की योजनाएं महत्वपूर्ण थीं। इस समय ब्रिटिश सरकार भारत को अपने कच्चा माल और सामानों की मण्डी भेजने वाले एक उपनिवेश की भूमिका के लिए तैयार कर रही थी। भारतीय कृषकों को प्रलोभन आदि देकर कपास, जूट, नील, कॉफी, चाय, मूंगफली, गन्ना आदि फसलों को उगाने के लिए कहा गया। उस समय इंग्लैंड में वस्त्र उत्पादन का प्रमुख उद्योग था, जिसके लिए कच्चे कपास की आवश्यकता थी, इसलिए अधिकांश ध्यान कपास की फसल पर दिया गया। इस नीति के कारण भारत के ग्रामीण इलाकों में भुखमरी फैल गई, क्योंकि कृषकों ने खाद्य फसलों से दूरी बढ़ाई और उनके उत्पादन में भारी कमी हुई। गेहूं, चावल, ज्वार और बाजरा की फसलों की कमी से इनका उत्पादन गिर गया और इनकी कमी से खाद्य संकट उत्पन्न हुआ । असम के किसानों को ब्रिटिश सरकार ने चाय उगाने पर मजबूर कर दिया। इसी तरह, ब्रिटिश शासकों ने बिहार और बंगाल में किसानों को नील उगाने पर मजबूर किया। इससे 1860 में बंगाल में ‘नील आन्दोलन’ शुरू हुआ। इसके अलावा, इंग्लैंड के उद्योगों के लिए निरंतर कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए बंगाल में जूट उत्पादन को बढ़ावा दिया गया।

व्यापार और सूदखोरी के माध्यम से, अंग्रेजों की भारत में व्यवसायीकरण की नीति ने जागीरदारी व्यवस्था को देश भर में बढ़ावा दिया। साथ ही, इसके व्यवसायीकरण ने किसानों के शोषण को बढ़ावा दिया, क्योंकि भूमि के मालिकों और पैसा उधार देने वालों के सामंती ढांचे को काफी मजबूत कर दिया गया था। भारत में व्यापार को बढ़ावा देने के लिए अंग्रेजों ने देश में रेलवे की स्थापना को बढ़ावा दिया। वास्तव में, 1850 के बाद देश में रेलवे की स्थापना ने भी वाणिज्यिक फसलों के उत्पादन को बढ़ावा दिया। ब्रिटिश शासकों ने नहरों की स्थापना करके कृषि को उन्नत बनाने की भी कोशिश की। पंजाब में नहरों का निर्माण कृषि को बढ़ावा देता था। परन्तु अंग्रेजों ने यहां भी कृषि को व्यवसायीकरण किया ही। उसने यहां पर किसानों को चीनी व कपास जैसी फसलों को ही उगाने के लिए मजबूर किया, जबकि मोटे अनाज और दालों का उत्पादन कम हुआ, जिससे पंजाब में खाद्य फसलों की कमी हुई। भारत में रेलों और परिवहन तंत्र के विकसित होने से अब भारतीय किसानों का विश्व बाजार से संपर्क बन गया। भारतीय किसानों ने नकद धन के लालच में अपनी फसलों को निम्न दरों पर बेचने लगे, जिससे उनका शोषण बढ़ गया। भारत में नकदी फसलों के प्रोत्साहन और कम उत्पादन के कारण खाद्यान्नों की कमी है। इससे खाद्य फसलों का मूल्य काफी बढ़ा। भुखमरी और अकाल की समस्याएं जगह-जगह छा गईं। रोगों और भूख के शिकार होते हैं

प्रश्न 3. ‘आर्थिक साम्राज्य’ की व्याख्या कीजिए ।
उत्तर – भारत में उपनिवेशवाद की तृतीय अवस्था को ‘आर्थिक साम्राज्यवाद’ के अन्तर्गत रखा जाता है।। क्योंकि इस युग में ब्रिटिश शासकों का लक्ष्य था कि वे आर्थिक साम्राज्यवाद पर कब्जा कर लें। 1858 से भारत में नए आए। उपनिवेशी युग शुरू हुआ, जिसकी प्रमुख विशेषता थी विदेशी खर्च करना और विश्वव्यापी प्रतिस्पर्धा होना। इसके परिणामस्वरूप तीव्र औद्योगीकरण और विश्व शक्ति बनना। औद्योगीकरण इस समय यूरोप के कई देशों में फैल गया था। विभिन्न देशों ने उद्योगों के लिए अलग-अलग तकनीकें अपनाईं। इसके परिवहन साधनों ने भी इन परिवर्तनों को बढ़ाना चाहा। इससे ब्रिटेन को यूरोपीय देशों से चुनौती मिलने लगी। औद्योगीकरण ने बहुत से देशों को बदल दिया, जिससे वे अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्व रखते हैं. अंग्रेजों को यूरोप और भारत में भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इन सब घटनाओं का परिणाम यह था कि अब अंग्रेजों को भारत पर अधिक शक्तिशाली होना चाहिए था। नौकरशाही को मजबूत और जिम्मेदार बनाना आवश्यक था। जिससे उसकी कार्यकुशलता, शक्ति आदि बढ़ें विभिन्न नीतियों के माध्यम से अंग्रेजों ने अपनी सत्ता को मजबूत करने की कोशिश की। उस समय, पूंजीवादी देशों ने ब्रिटेन को कमजोर करने की कोशिश की, जिसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने भारत पर अपना प्रभुत्व मजबूत करने की कोशिश की ताकि पूंजीवादी देशों की चुनौती का सामना किया जा सके। अब उदारवादी नीतियों की जगह आक्रामक और प्रतिक्रियावादी नीतियों को अपनाया जाता है। इसका प्रमाण कई गवर्नर जनरलों द्वारा किए गए कामों से मिलता है।

भारत में उपनिवेशी शासन को मजबूत करने के लिए लॉर्ड लिटन, डफरिन, लेंस डाउन और कर्जन ने उदारवादी नीतियों की जगह आक्रामक और प्रतिक्रियावादी नीतियों को अपनाया. इसके अलावा, ब्रिटिश पूंजी को भारत में आकर्षित करने, इसे सुरक्षित रखने और अन्य देशों के प्रतिद्वन्द्वियों को बाहर रखने की जरूरत थी। नई चुनौतियों का सामना करने के लिए इसके लिए बड़े पैमाने पर भारत में निवेश करने की कोशिश की। ब्रिटिश सरकार ने भारत पर अपना नियंत्रण मजबूत करने के लिए भारत में रेलवे, कोयला खानों, जूट के कारखानों, बागानों, जहाजरानी, बैंकिंग और सरकारी ऋणों को चुकाने के लिए काफी धन खर्च किया। इसके अलावा, कुछ नए उद्यम भी शुरू किए गए। ये प्रयास, हालांकि, अंग्रेजों की भेदभावपूर्ण नीति के कारण बहुत असफल रहे। यूरोपीय बैंकिंग संस्थाएं इस समय भारत का पूंजी बाजार चलाते थे। युद्ध के बाद पूर्व ब्रिटिश संस्थाओं ने औद्योगिक पूंजी के 75% और लाभ को ब्रिटेन में वापस भेजा। भारत को इससे कोई लाभ नहीं मिलता था।
ब्रिटिश सरकार ने भारतीय सेना और भारतीय संसाधनों को अपने विरोधियों से लड़ने के लिए विश्व भर में उपनिवेशों के विभाजित होने की लड़ाई में प्रयोग किया। ब्रिटिश सरकार ने अधिक धन और स्रोत पाकर अपने संघर्षों को अंजाम दिया। ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा और ब्रिटिश शासन की मजबूती के लिए, भारतीय सेना ने तत्कालीन विश्व में अंग्रेजों की एशिया और अफ्रीका में विस्तार को रोका। इसलिए अंग्रेजों ने इन सभी कार्यों में भारतीय सेना और संसाधनों का बहुत उपयोग किया। भारतीय संसाधनों से ही इन कार्यों पर धन खर्च किया गया था। भारतीय लोगों और किसानों पर भी इसका असर पड़ा। ताकि अधिक धन जुटाया जा सके, अधिक राजस्व की वसूली पर ध्यान दिया गया।

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