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NIOS Class 10 Social Science Chapter 25 सामाजिक आर्थिक विकास

NIOS Class 10 Social Science Chapter 25 सामाजिक आर्थिक विकास तथा अभावग्रस्त समूह का सशक्तिकरण

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NIOS Class 10 Social Science Chapter 25 Solution – सामाजिक आर्थिक विकास तथा अभावग्रस्त समूह का सशक्तिकरण

प्रश्न 1. सामाजिक-आर्थिक विकास की अवधारणा विकास के सभी आयामों को समाहित क्यों नहीं करती? दो कारण बताइए |
उत्तर – सामाजिक संस्थाओं को समाज की जरूरतों को पूरा करने के लिए बदलाव और सुधार किया जाता है, जबकि आर्थिक विकास में लोगों की आय बढ़ाने संबंधी सुधार किए जाते हैं. इसका उद्देश्य लोगों के सामाजिक व आर्थिक हित पर ध्यान देना है, जो प्रत्यक्ष और अनिवार्य मानवीय पहलू हैं।

प्रश्न 2. भारत में क्षेत्रीय असन्तुलन और सामाजिक आर्थिक विषमताएं क्यों हैं? इसके लिए उत्तरदायी छह कारकों का विश्लेषण कीजिए ।
उत्तर – भारत में क्षेत्रीय असंतुलन और सामाजिक-आर्थिक विषमताएं निम्नलिखित कारणों से हैं-
1.प्रत्येक व्यक्ति की आय देश का प्रति व्यक्ति आय दर अलग-अलग है। बिहार, मध्य प्रदेश, उड़ीसा और राजस्थान में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से कम है।
2. गरीबी – ग्रामीण और शहरी तथा राज्यों के बीच विषमता से बड़ी संख्या में आज भी लोग गरीब हैं।
3. औद्योगिक वृद्धि – केवल वाणिज्यिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर ध्यान देना ।
4. कृषि में वृद्धि – पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में ही कृषि क्षेत्र में उत्पादन बढ़ना ।
5. साक्षरता – राज्यों में साक्षरता दर काफी विषम है।
6. परिवहन और संचार परिवहन और संचार सुविधाएं भी विकसित एवं संपन्न राज्यों में ज्यादा हैं।
7. भौगोलिक कारक – सभी क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति अलग-अलग होना।
8. प्राकृतिक संसाधनों के वितरण में असमानता- कुछ राज्यों में बहुत अधिक प्राकृतिक संसाधन हैं तो कुछ में बहुत कम ।
9. आधारभूत संरचना व सुशासन की कमी – इन कारकों से भी राज्य तीव्र गति एवं समान रूप से विकास नहीं कर पा रहे हैं।

प्रश्न 3. समाज के अभावग्रस्त वर्गों के सामाजिक सशक्तीकरण के लिए भारत सरकार द्वारा उठाए गए छह कदमों की व्याख्या कीजिए ।
उत्तर– समाज के अभावग्रस्त समूहों के सामाजिक सशक्तीकरण वे लिए उठाए गए कदम-
1. प्रारंभिक शिक्षा को प्रोत्साहन । फीस माफी, निःशुल्क पुस्तकें, मध्याह्न भोजन व छात्रवृत्ति जैसी सुविधाएं देना ।
2. विभिन्न शिक्षण संस्थानों का निर्माण | देना ।
3. मैरिट योजना को बढ़ावा देने के लिए निदानात्मक कोचिंग
4. विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए निःशुल्क कोचिंग देना ।
5. उच्च प्राथमिक स्तर के बाद लड़के-लड़कियों को हॉस्टल की सुविधा देना।

प्रश्न 4. विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों की दर कम करने तथा शिक्षा में उपलब्धि स्तर को बढ़ाने के लिए भारत सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर- विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों की दर कम करने तथा शिक्षा में उपलब्धि स्तर बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा किए गए
उपाय-
1. प्रारंभिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण करना ।
2. 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाना ।
3. सभी बच्चों का विद्यालयों में नामांकन करना ।
4. बालिकाओं व अनुसूचित जातियों / जनजातियों को अधिक सुविधाएं देना ।
5. परिवार, समुदाय और पंचायतों की भागीदारी बढ़ाना ।
6. आर्थिक सहायता देना ।
7. पाठ्यक्रम में सुधार ।
8. लैंगिक भेदभावों को दूर करना ।
9. गुणवत्तापरक एवं जीवनपरक शिक्षा प्रदान करना ।
10. प्रौढ़ साक्षरता के लिए राष्ट्रीय साक्षरता मिशन चलाया गया।

प्रश्न 5. साक्षरता अभियान क्या है ? इस कार्यक्रम की सफलता के लिए अपनाए जाने वाली विभिन्न रणनीतियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर- 1988 में भारतीय संविधान मिशन का उद्घाटन हुआ था । 15 से 35 वर्ष की आयु के 10 करोड़ लोगों को समयबद्ध रूप से साक्षर बनाना इस मिशन का लक्ष्य है। राष्ट्रीय सारक्षरता मिशन की प्रमुख कार्य नीति निरक्षरता को दूर करना है; यह समयबद्ध, स्वैच्छिक, कम लागत वाला और परिणामोन्मुख है। साक्षरता अभियान के मूल चरण के बाद उत्तर साक्षरता अभियान शुरू किया गया है, यह सुनिश्चित करते हुए कि सीखने वाले लोग निर्देशित विकास की जगह स्वविकास कर रहे हैं। उत्तर साक्षरता में उन्नयन अत्यंत महत्वपूर्ण है। सतत् शिक्षा कार्यक्रमों से एक शिक्षित समाज बनाना प्रौढ़ शिक्षा का लक्ष्य है। यह कई कार्यक्रम प्रदान करता है, जिनमें सतत् शिक्षा, समानता, आय सृजन, जीवन संवृद्धि और व्यक्तिगत अभिरुचि प्रोत्साहन शामिल हैं।

वर्तमान में 450 जिलों में साक्षरता अभियान चल रहे हैं, जिनमें से 280 जिले उत्तर में साक्षरता चरण में हैं। वर्तमान में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन का ध्यान सात प्रमुख हिन्दी भाषी राज्यों पर है: बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, राज्यस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़. ये राज्यों में बहुत से लोग निरक्षर हैं। प्रौढ साक्षरता अभियान में पढ़ने वालों में लगभग 60 प्रतिशत महिलाएं हैं, 22 प्रतिशत से अधिक अनुसूचित जाति के लोग हैं, और 13 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के लोग हैं। राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय शिक्षा संस्थान का मुक्त बेसिक कार्यक्रम विद्यार्थियों को पहले से ही शिक्षित करने में मदद कर रहा है। इस कार्यक्रम में नवागंतुकों को रा. मु.वि.शि.सं. परीक्षा के बाद संयुक्त प्रमाणपत्र प्रदान करता है।

सामाजिक आर्थिक विकास तथा अभावग्रस्त समूह का सशक्तिकरण अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न

प्रश्न 1. मानव विकास की अवधारणा से क्या अभिप्राय है? विस्तृत व्याख्या कीजिए ।
उत्तर- मानव विकास की अवधारणा बहुत व्यापक और अस्पष्ट है। इसका अर्थ हर व्यक्ति का अलग हो सकता है | यहाँ अस्पष्टता से बचने के लिए केवल कुछ विशिष्ट तत्त्वों का उल्लेख किया गया है, जो सार्थक तुलना के लिए आसानी से परिभाषित किए जा सकते हैं । इनमें सबसे महत्वपूर्ण कारक औसत जीवन-प्रत्याशा या दीर्घ आयु है। ज्यादातर लोगों का मानना है कि उनका जीवन भौतिक रूप से बेहतर होगा जितनी अधिक औसत जीवन प्रत्याशा होगी। उदाहरण के लिए, 2000 में भारत का जीवन प्रत्याशा 63.3 वर्ष था, जबकि जापान का 81 वर्ष था। भारत की तुलना में जापान में जीवन की गुणवत्ता का स्तर स्पष्ट है। ज्ञान और कौशल इसके बाद आते हैं। जीवन स्तर का एक महत्वपूर्ण सूचक प्रौढ़ साक्षरता दर है।

इसके अलावा, स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या का अनुपात भी विचार किया जाता है। जिस देश में शिक्षा का स्तर उच्च होगा, वहाँ अधिक काम के अवसर होंगे और लोगों की जीवन की गुणवत्ता सुधरेगी। विश्व के अधिकांश विकसित देशों में प्रौढ़ साक्षरता दर 98-100% है। भारत में यह दर 57.2 प्रतिशत है। पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने प्रति व्यक्ति सकल घेरलू उत्पाद को तीसरा महत्वपूर्ण और आसानी से मापा जाने वाला सूचक माना है। कुल सकल घरेलू उत्पादों में बहुत अधिक असमानता है। कुछ देशों में प्रति व्यक्ति आय मात्र 40,000 से 50,000 डॉलर है। भारत में प्रति व्यक्ति आय २३५८ डॉलर है। उपर्युक्त तथ्यों को देखते हुए, हम कह सकते हैं कि जापान और अमेरिका जैसे देशों में मानव संसाधनों का विकास हुआ है। जबकि भारत में यह अभी भी उम्मीद की जाती है।

प्रश्न 2. सबके लिए स्वास्थ्य परियोजना के अन्तर्गत कौन-कौन से कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं?
उत्तर – सबके लिए स्वास्थ्य परियोजना के अन्तर्गत चलाए जा रहे कार्यक्रम निम्नलिखित हैं-

(क) प्रतिरक्षण कार्यक्रम – सार्विक प्रतिरक्षण कार्यक्रम 1990 तक 85 प्रतिशत शिशुओं और 100 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं के टीकाकरण के उद्देश्य से 1985 में शुरू किया गया। यह कार्यक्रम पूरे देश में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों द्वारा चलाया जाता है । इस दिशा में एक प्रयास हाल में चलाया जा रहा पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम है ।

(ख) पोषाहार कार्यक्रम – भारत में प्रमुख पोषण संबंधी समस्याएँ हैं – प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण, आयोडीन की कमी से होने वाले रोग, विटामिन ए की कमी और रक्ताल्पता । स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय में पोषाहार प्रकोष्ठ केन्द्रीय स्तर पर पोषाहार संबंधी सभी विषयों पर तकनीकी परामर्श प्रदान करता है। राज्यों और केन्द्र शासित क्षेत्रों में पोषाहार विभाग प्रत्येक जनसंख्या समूह के लिए आहार तथा पौष्टिक स्थिति का आकलन करता है, पोषण शिक्षा अभियान चलाता है, पूरक आहार आपूर्ति कार्यक्रमों तथा अन्य कदमों की देखभाल करता है समेकित बाल विकास योजना पोषण तथा स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को नियंत्रित करने के लिए सेवाओं के पैकेज प्रदान करती है। विटामिन-ए की कमी के कारण बच्चों में अंधेपन को रोकने के लिए उनके टीकाकरण के साथ ही विटामिन-ए की खुराक दी जाती है । इसी प्रकार महिलाओं और बच्चों में रक्ताल्पता रोकने के लिए लौह और फॉलिक एसिड की गोलियाँ स्वास्थ्य केन्द्रों द्वारा बांटी जाती हैं ।

(ग) प्रमुख बीमारियों के उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम– प्रमुख रोगों से मृत्यु और अस्वस्थता में कमी लाने के लक्ष्य से केन्द्रीय सरकार ने कई राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों को लागू किया है। इन स्वास्थ्य कार्यक्रमों में मलेरिया, अंधापन, कुष्ठ रोग, तपेदिक और एड्स उन्मूलन शामिल हैं। इनमें रक्त सुरक्षा, यौन रोगों का नियंत्रण और कैंसर का नियंत्रण शामिल हैं। इन राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों में आयोडीन की कमी से होने वाले रोगों, डेंगू, फाइलेरिया, कालाजार और जापानी मस्तिष्क ज्वर भी शामिल हैं । राष्ट्रीय संक्रामक रोग निगरानी कार्यक्रम भी इससे संबंधित है। यह मुख्यतः महामारी बीमारियों पर केंद्रित है; जैसे डेंगू, अतिसार, हैजा, यकृत शोथ और प्लेग। यह कार्यक्रम जिला स्तर पर स्वास्थ्य विभाग को इन रोगों पर निगरानी करने और महामारी की रोकथाम करने के लिए सक्षम बनाने का लक्ष्य रखता है।

(घ) परिवार – कल्याण कार्यक्रम—जैसा पहले कहा गया था, भारत विश्व में पहला देश था, जिसने 1951 में समग्र परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू किया था। जिम्मेदार और नियोजित मातृत्व और पितृत्व को परिवार कल्याण कार्यक्रम स्वैच्छिक तरीकों से बढ़ावा देता है। पूरे भारत में चल रहे स्वास्थ्य केंद्रों ने ये सभी सुविधाएँ दी हैं। शिशु रक्षा और सुरक्षित मातृत्व कार्यक्रम और प्रजनन और शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रम दो प्रमुख परिवार कल्याण कार्यक्रम हैं. ये कार्यक्रम शिशुओं और माँओं को बीमारियों से बचाता है और उनकी रक्षा करता है। प्रजनन और शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रम परिवार नियोजन, जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य और यौन संबंधों से फैलने वाले रोगों का नियंत्रण करते हैं ।

(ङ) स्वास्थ्य शिक्षा का प्रसार – केन्द्रीय स्वास्थ्य शिक्षा ब्यूरो, भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन, राज्य और जिला स्तर पर स्वास्थ्य और संबंधित क्षेत्रों में सभी श्रेणी के कर्मचारियों को सेवाकालीन प्रशिक्षण देता है। प्रशिक्षण के बाद वे समाज के हर कोने में स्वास्थ्य जागरूकता का संदेश फैलाते हैं। मीडिया विभाग स्वास्थ्य संबंधी तीन पत्रिकाएँ बनाता है। यह जन स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण विषयों पर मुद्रित सामग्री बनाता है। विद्यालय स्वास्थ्य विभाग विद्यार्थियों को स्वास्थ्य के बारे में जानने के लिए प्रेरित करता है। स्वास्थ्य शिक्षा सेवा प्रभाग राज्यों के स्वास्थ्य शिक्षा ब्यूरो को तकनीकी सलाह देता है और सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं को देश भर में स्वास्थ्य शिक्षा के प्रचार-प्रसार में सहायता देता है।

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