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CBSE Sample Papers for Class 12 Hindi Set 9 with Solutions

Students must start practicing the questions from CBSE Sample Papers for Class 12 Hindi with Solutions Set 9 are designed as per the revised syllabus.

CBSE Sample Papers for Class 12 Hindi Set 9 with Solutions

समय : 3 घंटे
पूर्णांक : 80

सामान्य निर्देश:

  • इस प्रश्न-पत्र में खंड ‘अ’ में वस्तुपरक तथा खंड ‘ब’ में वर्णनात्मक प्रश्न पूछे गए हैं।
  • खंड ‘अ’ में 40 वस्तुपरक प्रश्न पूछे गए हैं। सभी 40 प्रश्नों के उत्तर देने हैं।
  • खंड ‘ब’ में वर्णनात्मक प्रश्न पूछे गए हैं। प्रश्नों के उचित आंतरिक विकल्प दिए गए हैं।
  • दोनों खंडों के प्रश्नों के उत्तर देना अनिवार्य है।
  • यथासभव दोनों खंडों के प्रश्नों के उत्तर क्रमशः लिखिए।

खंड ‘अ’
(वस्तुपरक प्रश्न)

खंड ‘अ’ में अपठित बोध, अभिव्यक्ति और माध्यम, पाठ्य-पुस्तक आरोह भाग-2 व पूरक पाठ्य पुस्तक वितान भाग-2 से संबंधित बहुविकल्पीय प्रश्न पूछे गए हैं। जिनमें प्रत्येक प्रश्न के लिए 1 अंक निर्धारित है।

अपठित बोध –

प्रश्न 1.
निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनकर लिखिए। (1 × 10 = 10)

ईश्वर सच्चिदानंद स्वरूप है तथा उसकी सर्वोक्कृष्ट रचना है-मानव। कण-कण में व्याप्त होने के साथ ही वह सर्वाधिक निकट हमारे अंदर स्थित है, फिर भी मानव हताश, निराश, दु:खी तथा अशांत है। इसका कारण है-ईश्वरीय ज्ञान का अभाव। प्रश्न है उसे कैसे जाना जाए? ईश्वर से मिलन का सीधा-सरल तरीका है-ध्यान। ध्यान है देखना, पर इन बाहरी आँखों से नहीं, अंतर्दृष्टि से देखना। ध्यान के द्वारा मन को एकात्र कर प्राण में, आत्मा में स्थिर किया जाता है। जैसे सूर्य की बिखरी किरणों को सूक्ष्मदर्शी यंत्र द्वारा एक बिंदु पर केंद्रित करने से अग्नि उत्पन्न होती है, वैसे ही ध्यान द्वारा चित्त की वृत्तियों के घनीभूत होने पर चैतन्य शक्ति का दिव्य प्रकाश, अमृतरस तथा अनहद संगीत के रूप में प्रकटीकरण होता है, जिसे आत्म-साक्षात्कार कहते हैं। ध्यान आत्मा का भोजन तथा मुक्ति का मार्ग है, जिससे परम तत्त्व परमात्मा के रहस्यों का उद्घाटन अंतरात्मा में होता है।

ध्यान सभी धमों का सार तथा सभी संतों एवं महापुरुषों द्वारा अपनाया गया मार्ग है। ध्यान के महत्त्व को समझे तथा किए बिना कोई भी व्यक्ति धार्मिक तथा अध्यात्मवादी नहीं हो सकता, क्योंकि ध्यान से चित्त का रूपांतरण होता है। पारलौकिक के साथ-साथ लौकिक रूप से भी ध्यान मानवोपयोगी है। मन के विकार शारीरिक व्याधियों के मूल हैं। इस साधना से श्वासों की गति नियमित होती है, जिससे व्याधिकारक चंचल मन शांत होता है और अनेक प्रकार की व्याधियों का शमन होता है।

ध्यान से मस्तिष्क की क्रियाशीलता बढ़ती है, बुद्धि कुशाग्र होती है तथा समय-समय पर आने वाले प्रश्नों की समस्याओं का समाधान आंतरिक शक्ति से होता है। साधना से निष्क्रिय दायाँ मस्तिष्क सक्रिय हो जाता है तथा मस्तिष्क की कार्यकुशलता और शक्ति दस गुना बढ़ जाती है। ध्यान परमानंद का झरना है। इस प्रक्रिया में आनंद की रिमझम वर्षा होती है, क्योकि साधक के ध्यानस्थ होने पर मस्तिष्क में तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो शांति तथा आनंद का कारण होती हैं, किंतु इस हेतु मन का शांत होना आवश्यक है। प्रसन्नता की प्राप्ति हेतु आनंद केंद्र पर ध्यान कर उसे जाग्रत किया जाता है, जिससे व्यक्ति कठिन-से-कठिन परिस्थिति में भी खिन्न व विचलित नहीं होता तथा सदैव प्रसन्न व तनावमुक्त जीवन व्यतीत करता है। ध्यान की प्रक्रिया सरल है, किंतु आवश्यकता है इसे जानने की। तत्ववृष्टा सद्गुरु से इसको जानकर इसका नित्य प्रति अभ्यास करना चाहिए। यह साधना शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक विकारों को दूर कर सुख, समृद्धि, दीर्घायु तथा आनंद प्रदायक है। स्वयं के अतिरिक्त परिवार एवं विश्व में शांति व मंगल-भावना हेतु भी साधना आवश्यक है।

(क) गद्यांश के अनुसार शारीरिक व्याधियों का मूल किसे कहा गया है?
(i) ध्यान को
(ii) मन की शांति को
(iii) मन के विकार को
(iv) चंचल मन को
उत्तर :
(iii) मन के विकार को

(ख) कण-कण में ईश्वर व्याप्त है फिर भी मानव हताश, निराश और दुःखी क्यों रहता है?
(i) स्वयं के कमों के कारण
(ii) ईश्वर का ज्ञान न होने के कारण
(iii) बुद्धि के अभाव के कारण
(iv) दूसरों के सुख के कारण
उत्तर :
(ii) ईश्वर का झ्ञान न होने के कारण

(ग) ‘घनीभूत’ शब्द का तात्पर्य है
(i) प्रगाढ
(ii) सघन
(iii) केंद्रीभूत
(iv) गहरा
उत्तर :
(iii) केंद्रीभूत

(घ) गद्यांश के अनुसार आत्म साक्षात्कार से क्या तात्पर्य है?
(i) स्वयं से परिंचित होना
(ii) स्वयं को तनावमुक्त रखना
(iii) बदय में अंतद्वद्व चलना
(iv) ईश्वर प्राप्ति के लिए प्रेरित होना
उत्तर :
(i) स्वर्यं से परिचित होना

(ङ) ध्यान करने से मनुष्य को क्या लाभ होता है?
(i) बुद्धि कुशाग्र होती है
(ii) मस्तिष्क की क्रियाशीलता बढ़ती है
(iii) समस्याओं का समाधान करने की आंतरिक शक्ति बढ़ती है
(iv) ये सभी
उत्तर :
(iv) ये सभी

(च) निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए
1. ध्यान के द्वारा मनुष्य को परमानंद की प्राप्ति होती है।
2. शांत मन से ही ध्यानस्थ होने पर साधक को आनंद की अनुभूति होती है।
3. ध्यान की प्रक्रिया बहुत क्लिष्ट है। इसे तत्त्वदृष्टा गुरु के माध्यम से ही जाना जा सकता है। उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(i) केवल 1
(ii) केवल 3
(iii) 1 और 2
(iv) 2 और 3
उत्तर :
(iii) 1 और 2

(छ) ‘ध्यान परमानंद का झरना है।’ लेखक इससे सिद्ध करना चाहते हैं कि
(i) ध्यान लगाने से आनंद का झरना प्रवाहित होता है
(ii) ध्यान लगाने से मस्तिष्क में तरंगें उत्पन्न होती हैं
(iii) ध्यान लगाने से शांति व आनंद की प्राप्ति होती है
(iv) ध्यान लगाने से समस्याओं का समाधान स्वतः हो जाता है
उत्तर :
(iii) ध्यान लगाने से शांति व आनंद की प्राप्ति होती है

(ज) निम्नलिखित कथन और कारण को ध्यानपूर्वक पढ़िए और सही विकल्प चुनकर लिखिए।
कथन (A) ध्यान सभी संतों एवं महापुरुषों द्वारा अपनाया गया मार्ग है।
कारण (R) ध्यान से श्वासों की गति नियमित होती है तथा चंचल मन शांत होता है। कूट
(i) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है
(ii) कथन (A) गलत है, कितु कारण (R) सही है
(iii) कथन (A) तथा कारण (R) दोनों गलत हैं
(iv) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, लेकिन कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता है
उत्तर :
(i) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही है, लेकिन कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है।

(झ) ध्यान के महत्त्व को समझे बिना या किए बिना कोई भी व्यक्ति धार्मिक तथा अध्यात्मवादी क्यों नहीं हो सकता?
(i) क्योंकि संतों द्वारा इसे अपनाया गया है
(ii) क्योंकि ध्यान से चित्त का रूपांतरण होता है
(iii) क्योंकि ध्यान से व्यक्ति स्वार्थी होता है
(iv) क्योंकि ध्यान सभी कष्टों का निवारण है
उत्तर :
(ii) क्योंकि ध्यान से चित्त का रूपांतरण होता है

(ञ) प्रस्तुत गद्यांश किस विषयवस्तु पर आधारित है?
(i) मन की शांति पर
(ii) ध्यान के महत्त्व पर
(iii) आनंद प्राप्ति के साधन पर
(iv) मस्तिष्क के विकास पर
उत्तर :
(ii) ध्यान के महत्त्व पर

प्रश्न 2.
दिए गए पद्यांश पर आधारित प्रश्नों को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनकर लिखिए। (1 × 5 = 5)

इन लहरों के टकराने पर, आता रह-रह कर प्यार मुझे।।
मैं हूँ अपने मन का राजा, इस पार रहूँ, उस पार चलूँ
मै मस्त खिलाड़ी हूँ ऐसा जी चाहे जीतूँ, हार चलूँ।
मैं हूँ अबाध, अविराम अथक, बंधन मुझको स्वीकार नहीं।
मैं नहीं अरे ऐसा राही, जो बेबस-सा मन मार चलूँ।।
कब रोक सकी मुझको चितवन, मदमाते कजरारे घन की,

कब लुभा सकी मुझको बरबस, मधु-मस्त फुहारें सावन की।
जो मचल उठें अनजाने ही अरमान नहीं मेरे ऐसे-
राहों को समझा लेता हूँ सब बात सदा अपने मन की
इन उठती-गिरती लहरों का कर लेने दो भृंगार मुझे,
इन लहरों के टकराने पर आता रह-रह कर प्यार मुझे।।

(क) कवि को कौन नहीं रोक पाया?
(i) हार के बदले मिली निराशा
(ii) किसी सुंदर प्रेयसी का आकर्षण
(iii) किसी का दु:ख
(iv) जीवन की बाधाएँ
उत्तर :
(iv) जीवन की बाथाएँ

(ख) इस पद्यांश से हमें क्या सीख मिलती है?
(i) निर्भींक और स्वाभिमानी रहने की
(ii) हठी व सबल बनने की
(iii) निर्मम व क्रूर बनने की
(iv) नि:स्वार्थी ब दृढ़ निश्चयी बनने की
उत्तर :
(i) निर्भीक और स्वाभिमानी रहने की

(ग) निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए
1. कवि स्वतंत्रता का पुजारी है।
2. कवि को किसी प्रकार का बंधन स्वीकार नहीं है।
3. कवि सावन की फुहाररूपी प्रेयसी का श्रृंगार करना चाहता है। उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(i) केवल 1
(ii) केवल 2
(iii) 1 और 2
(iv) 1 और 3
उत्तर :
(iii) 1 और 2

(घ) ‘कब लुभा सकी मुझको बरबस’ में ‘बरबस’ शब्द का अर्थ है
(i) निरर्थक
(ii) लाचार
(iii) व्यर्थ
(iv) बलपूर्वक
उत्तर :
(iv) बलपूर्वक

(ङ़) कॉलम 1 को कॉलम 2 से सुमेलित कीजिए

कॉलम 1 कॉलम 2
A. जीवन पथ पर चलते हुए 1. कहीं भी रहने के लिए स्वतंत्र
B. अपने मन का राजा 2. किसी भी प्रकार का बंधन
C. कवि को स्वीकार नहीं 3. भयभीत न होने

कूट
A B C
(i) 2 3 1
(ii) 1 3 2
(iii) 3 1 2
(iv) 1 2 3
उत्तर :
(iii) 3 1 2

अभिव्यक्ति और माध्यम –

प्रश्न 3.
निम्नलिखित प्रश्नों को ध्यानपूर्वक पढ़कर सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनकर लिखिए। (1 × 5 = 5)

(क) किसी घटना की सूचना देने और उसके दृश्य दिखाने के साथ प्रत्यक्षदर्शियों के कथन दिखा-सुनाकर समाचार को प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करना क्या कहलाता है?
(i) न्यूज रिपोर्टिंग
(ii) एंकर बाइट
(iii) बीट्स
(iv) क्लॉस न्यूज
उत्तर :
(ii) एकर बाइट

(ख) किसी बड़ी खबर को कम-से-कम शब्दों में दर्शकों तक तत्काल पहुँचाना क्या कहलाता है?
(i) ट्राई एंकर
(ii) फ़ोन-इन
(iii) ब्रेकिंग न्यूज
(iv) लाइव
उत्तर :
(iii) श्रेकिंग न्यूज

(ग) भारत में कौन-सा समाचार-पत्र इंटरनेट पर उपलब्ध है?
(i) हिंदुस्तान टाइम्स
(ii) हिंदू
(iii) टाइम्स ऑफ इंडिया
(iv) ये सभी
उत्तर :
(iv) ये सभी

(घ) निम्न में से कौन-सा विशेष लेखन का क्षेत्र नहीं है?
(i) अर्थ व्यापार
(ii) खेल
(iii) आम ब साधारण व्यक्ति
(iv) फिल्म-मनोरंजन
उत्तर :
(iii) आम व साधारण व्यक्ति

(ङ) सूची I को सूची II से सुमेलित कीजिए

सूची I सूची II
A. हिंदी की सर्वश्रेष्ठ साइट 1. टेलीविजन
B. भारत की पहली साइट 2. एच टी एम एल
C. नई वेब भाषा 3. रीडिफ़
D. नेट साउंड 4. बी बी सी

कूट
A B C D
(i) 4 3 2 1
(ii) 2 3 4 1
(iii) 3 4 1 2
(iv) 1 4 2 3
उत्तर :
(i) 4 3 2 1

पाठ्य-पुस्तक आरोह भाग 2

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पद्यांश के प्रश्नों को ध्यानपूर्वक पढ़कर सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनकर लिखिए। (1 × 5 = 5)
सोचिए
बताइए
आपको अपाहिज होकर कैसा लगता है कैसा
यानी कैसा लगता है
(हम खुद इशारे से बताएँगे कि क्या ऐसा?) सोचिए
बताइए
थोड़ी कोशिश करिए
(यह अवसर खो देंगे?)
आप जानते हैं कि कार्यक्रम रोचक बनाने के वास्ते
हम पूछ-पूछकर उसको रूला देंगे
इंतजार करते हैं आप भी उसके रो पड़ने का करते हैं?
(यह प्रश्न पूछा नहीं जाएगा)

(क) अपाहिज व्यक्ति को बार-बार अपना दुःख बताने के लिए मजबूर करने के पीछे दूरदर्शन वालों का क्या उद्देश्य हो सकता है?
(i) अपाहिज के प्रति संवेदनशीलता होना
(ii) अपाहिज की स्थिति में सुधार हेतु प्रयास करना
(iii) अपने कार्यक्रम को व्यावसायिक रूप से सफल बनाना
(iv) ये सभी
उत्तर :
(iii) अपने कार्यक्रम को व्यावसायिक रूप से सफल बनाना

(ख) किसी के दुःख का प्रदर्शन करके कार्यक्रम को रोचक बनाना क्या है?
(i) समय की माँग
(ii) मानवता के विरुद्ध
(iii) अनिंदनीय कार्य
(iv) दु:ख की अभिव्यक्ति
उत्तर :
(ii) मानवता के विरुद्ध

(ग) ‘हम पूछ-पूछकर रुला देंगे’ पंक्ति में कौन-सा भाव निहित है?
(i) क्रूरता का
(ii) सामाजिक न्याय का
(iii) मानवीय करुणा का
(iv) दु:ख एवं संवेदनशीलता का
उत्तर :
(i) क्रूरता का

(घ) निम्नलिखित कथन और कारण को ध्यानपूर्वक पदिए और सही विकल्प चुनकर लिखिए।
कथन (A) दूरदर्शन पर दर्शक उस अपंग व्यक्ति के रोने का इंतजार करते हैं।
कारण (R) दर्शक भी दूरदर्शन पर अपंग व्यक्ति के दु:ख-दर्द को उसके मुख से सुनना चाहते हैं। कूट
(i) कथन (A) सही है, परंतु कारण (R) गलत है
(ii) कथन (A) गलत है, परंतु कारण (R) सही है
(iii) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, लेकिन कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता है
(iv) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर :
(iv) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है।

(ङ) अलंकार की दृर्टि से कौन-सा विकल्प सही है?
(i) अपाहिज होकर-उत्र्रेक्षा अलंकार
(ii) कैसा लगता है-पुनरुक्ति अलंकार
(iii) रोचक बनाने के वास्ते-उपमा अलंकार
(iv) पूछ-पूछकर-अनुप्रास अलंकार
उत्तर :
(iv) पूछ-पूछकर-अनुप्रास अलंकार

प्रश्न 5.
निम्नलिखित गद्यांश के प्रश्नों को ध्यानपूर्वक पढ़कर उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनकर लिखिए। (1 × 5 = 5)

जाति-प्रथा पेशे का दोषपूर्ण पूर्व निर्धारण ही नहीं करती, बल्कि मनुष्य को जीवनभर के लिए एक पेशे से बाँध भी देती है। भले ही पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने के कारण वह भूखा मर जाए। आधुनिक युग में यह स्थिति प्राय: आती है, क्योकि उद्योग-धंधों की प्रक्रिया व तकनीक में निरंतर विकास और कभी-कभी अकस्मात् परिवर्तन हो जाता है, जिसके कारण मनुष्य को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है और यदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपना पेशा बदलने की स्वतंत्रता न हो, तो इसके लिए भूखा मरने के अतिरिक्त क्या चारा रह जाता है? हिंदू धर्म की जाति-प्रथा किसी भी व्यक्ति को ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती है, जो उसका पैतृक पेशा न हो, भले ही वह उसमें पारंगत हो। इस प्रकार, पेशा परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति-प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है।

(क) गद्यांश के अनुसार जाति प्रथा में लेखक ने क्या दोष देखा है?
(i) जाति-प्रथा जन्म से ही पेशा तय कर देती है
(ii) जीवनभर मनुष्य को एक पेशे में बाँध देती है
(iii) पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने पर मनुष्य को भूखा मरना पड़ता है
(iv) उपरोक्त सभी
उत्तर :
(iv) उपरोक्त सभी

(ख) मनुष्य को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता किस कारण पड़ती है?
(i) उद्योग-धंधों की प्रक्रिया व तकनीक में निरंतर विकास के कारण
(ii) स्वयं को उच्च वर्ग में सम्मिलित करने के कारण
(iii) निम्न वर्ग को घृणा की दृष्टि से देखे जाने के कारण
(iv) प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण
उत्तर :
(i) उद्योग-धधों की प्रक्रिया व तकनीक में निरंतर विकास के कारण

(ग) निम्नलिखित कथन और कारण को ध्यानपूर्वक पढ़िए और सही विकल्प चुनकर लिखिए।
कथन (A) जाति-प्रथा बेरोजगारी का प्रत्यक्ष व प्रमुख कारण है।
कारण (R) जाति-प्रथा प्रतिकूल परिस्थितियों में भी व्यक्ति को पेशा बदलने की अनुमति नहीं देती।
कूल
(i) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है
(ii) कथन (A) गलत है, किंतु कारण (R) सही है
(iii) कथन (A) तथा कारण (R) दोनों गलत हैं
(iv) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, लेकिन कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता है
उत्तर :
(i) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है

(घ) कॉलम 1 को कॉलम 2 से सुमेलित कीजिए

कॉलम 1 कॉलम 2
A. जाति प्रथा की जटिल प्रक्रिया के तहत 1. वह कार्य जीवनपर्यंत करना
B. जिस जाति में जन्मे 2. पेशा बदलने की छूट नहीं देती
C. जाति प्रथा 3. व्यक्ति का आधारभूत जीवन और कठिन हो गया

कूट
A B C
(i) 2 3 1
(iii) 1 2 3
(ii) 3 1 2
(iv) 3 2 1
उत्तर :
(ii) 3 1 2

(ङ) निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए (1)
1. जीवन-यापन न कर पाने की स्थिति में भी व्यक्ति जाति-प्रथा के कारण अपना व्यवसाय नहीं बदल सकता।
2. आधुनिक युग में जाति-प्रथा की सीमा में रहते हुए भी अपना मनचाहा पेशा अपना सकता है।
3. हिंदू धर्म की जाति-प्रथा में व्यक्ति को अपना पैतृक व्यवसाय ही करना आवश्यक है। उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(i) केवल 1
(ii) केवल 3
(iii) 1 और 2
(iv) 1 और 3
उत्तर :
(iv) 1 और 3

पूरक पाठ्य-पुस्तक वितान भाग 2

प्रश्न 6.
निम्नलिखित प्रश्नों को ध्यानपूर्वक पढ़कर सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनकर लिखिए। (1 × 10 = 10)

(क) ‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी में यशोधर बाबू के जीवन में किशनदा का महत्व किस रूप में है?
(i) वे उन्हें अपना भाई मानते थे
(ii) वे उन्हें अपना गुरु मानते थे
(iii) वे उन्हें अपना सेवक मानते थे
(iv) वे उन्हें अपना बेटा मानते थे
उत्तर :
(ii) वे उन्हें अपना गुरु मानते थे

(ख) यशोधर बाबू अपने बच्चों से क्या अपेक्षा रखते हैं? ‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी के आधार पर सटीक विकल्प चुनिए।
(i) उनके बच्चे अब घर की सभी जिम्मेदारियों का भार अपने ऊपर ले लें
(ii) उनके बच्चे रूढ़िवादी परंपराओं का पालन करें
(iii) उनके बच्चे पार्टी वगैरह न किया करें
(iv) उनके बच्चे आधुनिक विचारों को न अपनाएँ
उत्तर :
(i) उनके बच्चे अब घर की सभी जिम्मेदारियों का भार अपने ऊपर ले लें

(ग) यशोधर बाबू की पत्नी किस कारण उनसे विपरीत सोच रखती हैं?
(i) घर से बाहर निकलकर नौकरी करने के कारण
(ii) आधुनिक जीवन मूल्यों को अपनाने के कारण
(iii) अपने पैरों पर खड़े होने के कारण
(iv) स्त्रियों के विषय में अच्छी सोच रखने के कारण
उत्तर :
(ii) आधुनिक जीवन मूल्यों को अपनाने के कारण

(घ) निम्नलिखित कथन और कारण को ध्यानपूर्वक पढिए और सही विकल्प चुनकर लिखिए।
कथन (A) कुछ किसान बाद में गुड़ निकालने को ज्यादा बेहतर समझते थे।
कारण (R) देर तक खड़ी रहने वाली ईंख के रस में गुड़ ज्यादा निकलता है।
कूट
(i) कथन (A) सही है, परंतु कारण (R) गलत है
(ii) कथन (A) गलत है, परंतु कारण (R) सही है
(iii) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, लेकिन कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता है
(iv) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है
उत्तर :
(iv) कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है।

(ङ) ‘जूझ’ कहानी में आनंदा जब पहले दिन पाठशाला गया, तो उसकी क्या प्रतिक्रिया थी?
(i) उसकी खुशी का ठिकाना न रहा
(ii) वह अत्यंत उदास था
(iii) वह क्रोधित हुआ
(iv) उसने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की
उत्तर :
(i) उसकी खुशी का ठिकाना न रहा

(च) आनंदा और उसकी माँ ने दत्ता जी राव के पास जाने की क्यों सोची? ‘जूझ’ कहानी के आधार पर सटीक विकल्प चुनिए।
(i) ताकि दत्ता जी राव उनका लगान माफ करा दें
(ii) ताकि दत्ता जी राव उनकी कुछ आर्थिक सहायता कर सकें
(iii) ताकि वे लेखक को पाठशाला भेजने के लिए दादा को समझाकर राजी कर सकें
(iv) ताकि वे खेती-बाड़ी में कुछ सहायता कर सकें
उत्तर :
(iii) ताकि वे लेखक को पाठशाला भेजने के लिए दादा को समझाकर राजी कर सकें

(छ) सिंधु घाटी सभ्यता की खोज की शुरुआत में वहाँ की खेती के संबंध में क्या समझा जाता था?
(i) इस घाटी के लोग उन्नत किस्म की खेती करते थे
(ii) इस घाटी के लोग अन्न नहीं उगाते थे
(iii) इस घाटी के लोग केवल ज़्वार की खेती करते थे
(iv) इस घाटी के लोग खेती में कोई रुचि नहीं रखते थे
उत्तर :
(ii) इस घाटी के लोग अन्न नहीं उगाते थे

(ज) सिंधु घाटी की सभ्यता दूसरी सभ्यताओं से किस प्रकार भिन्न थी?
(i) यह सभ्यता पूर्णत: राजात्रित सभ्यता थी
(ii) यह सभ्यता साधन संघन्न सभ्यता थी
(iii) इसमें किसी एक का प्रभुत्व नहीं था, बल्कि एकता व समृद्धि से परिपूर्ण सभ्यता थी
(iv) इसमें निम्न वर्ग पर विशेष ध्यान दिया गया, ताकि उनका विकास हो सके
उत्तर :
(iii) इसमें किसी एक का प्रभुत्व नहीं था, बल्कि एकता व समृद्धि से परिपूर्ण सभ्यता थी

(झ) यशोधर बाबू के परिवार के संबंध में कौन-सा कथन सही नहीं है?
(i) यशोधर बाबू का परिवार आधुनिक विचारों का समर्थक है
(ii) यशोधर बाबू की पत्नी पुरानी परंपराओं को मानती थी
(iii) यशोधर बाबू को आधुनिक लोगों के विचार बिल्कुल पसंद नहीं थे
(iv) यशोधर बाबू का अपने परिवार के साथ मतभेद बना रहता था
उत्तर :
(ii) यशोधर बाबू की पत्नी पुरानी परंपराओं को मानती थी

(ञ) निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए
1. सिंधु सभ्यता समाज पोषित संस्था का समर्थन करती थी।
2. सिंधु सभ्यता में राजमहलों, मंदिरों व समाधियों के अनेक अवशेष मिलते हैं।
3. सिंधु सभ्यता के कोई भी भव्य व विशाल मूर्ति उपलब्ध नहीं हुई।
4. सिधु सभ्यता में समाज में सौंदर्य बोध था, राजनीतिक या धार्मिक आडंबर नहीं। उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(i) केवल 1
(ii) केवल 3
(iii) 1, 2 और 4
(iv) 1, 3 और 4
उत्तर :
(iv) 1, 3 और 4

खंड ‘ब’
(वर्णनात्मक प्रश्न)

खंड ‘ब’ में जनसंचार और सृजनात्मक लेखन, पाठ्य-पुस्तक आरोह भाग-2 व पूरक पाठ्य-पुस्तक वितान भाग-2 से संबंधित वर्णनात्मक प्रश्न पूछे गए हैं, जिनके निर्धारित अंक प्रश्न के सामने अंकित हैं।

जनसंचार और सृजनात्मक लेखन –

प्रश्न 7.
निम्नलिखित दिए गए 3 विषयों में से किसी 1 विषय पर लगभग 120 शब्दों में रचनात्मक लेख लिखिए (6 × 1 = 6)

(क) रामचरितमानस की प्रासंगिकता
उत्तर :
आज हर ओर मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं परंपराओं का हास होता जा रहा है। बर्तमान पीढ़ी आज गुणों की अपेक्षा दुर्गुणों को अपनाती जा रही है। आज जन्म देने वाले माता-पिता का सम्मान दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा है, इसलिए पुन: रामचरितमानस में वर्णित आदर्शों, मान्यताओं और मर्यादाओं की रक्षा के लिए भावी पीढ़ी को रामचरितमानस का ज्ञान होना आवश्यक है। ‘रामचरितमानस’ मेरी सर्वाधिक प्रिय पुस्तक है। इसे हिंदू परिवारों में धर्मग्रंथ का दर्जा प्राप्त है, इसलिए ‘रामचरितमानस’ हिंदू संस्कृति का केंद्र है।
जॉर्ज त्रियर्सन ने कहा है-‘ ईसाइयों में बाइबिल का जितना प्रचार है, उससे कहीं अधिक प्रथार और आदर हिंदुओं में रामचरितमानस का है।”

‘रामचरितमानस’ अवधी भाषा में रथा गया महाकाव्य है, इसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास ने सोलहर्वी सदी में की थी। इसमें भगवान राम के जीवन का वर्णन है। यह महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित संस्कृत के महाकाव्य ‘ रामायण’ पर आधारित है। तुलसीदास ने इस महाकाव्य को सात कांडों में विभाजित किया है। इन सात कांडों के नाम हैं- ‘बालकांड’, ‘अयोध्याकांड’, ‘अरण्यकोंड’, ‘किष्धियाकांड’, ‘सुंदरकांड’, ‘लंकाकांड’ एवं ‘उत्तरकांड ‘।

‘रामचरितमानस’ में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जी के उत्तम चरित्र का विषद् वर्णन है, जिसका अध्ययन पाश्चात्य सभ्यता की अंधी दौड़ में भटकती वर्तमान पीदी को मर्यादित करने के लिए आवश्यक है, क्योंकि ‘रामचरितमानस’ में वर्णित रामचंद्र जी का संपूर्ण जीवन शिक्षाप्रद है। ‘रामचरितमानस’ में गुरु-शिष्य, माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहन इत्यादि के आदर्शो को इस तरह से प्रस्तुत किया गया है कि ये आज भी भारतीय समाज के प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं। यह तत्कालीन समाज को विभिन्न बुराइयों से मुक्त कर उसमें श्रेष्ठ गुण विकसित करने का मार्गदर्शन करती है।

काव्य-शिल्य एवं भाषा के दृष्टिकोण से भी ‘रामचरितमानस’ अति समृद्ध है। इसके छंद और चौपाइयाँ आज भी जन-जन में लोकप्रिय हैं। अधिकतर हिंदू घरों में इसका पावन पाठ किया जाता है। रामचरितमानस के समान अब तक कोई दूसरा काव्य नहीं रचा जा सका है, जिसका भारतीय जनमानस पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा हो। इस ग्रंथ की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता एवं गेयता है, इसलिए इसे पढ़ने में आनंद आता है। जीवन के सभी संबंधों पर आधारित ‘ रामचरितमानस’ के दोहे एवं चौपाइयाँ आमजन में अभी भी कहावतों की तरह लोकप्रिय हैं। ‘रामचरितमानस’ को भारत में सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला ग्रंथ माना जाता है। विदेशी विद्वानों ने भी इसकी खूब प्रशंसा की है।

(ख) देशप्रेम की भावना सर्वश्रेष्ठ भावना
उत्तर :
“जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं है, पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।”
मैथिलीशरण गुप्त की इन काव्य पंक्तियों का अर्थ यह है कि देशप्रेम के अभाव में मनुष्य जीवित प्राणी नहीं, बल्कि पत्थर के ही समान कहा जाएगा। हम जिस देश या समाज में जन्म लेते हैं, उसकी उन्नति में समुचित सहयोग देना हमारा परम कर्ताव्य है। स्वदेश के प्रति यही कर्तव्य भावना, इसके प्रति प्रेम अर्थात् स्वदेश-प्रेम ही देशभक्ति का मूल स्रोत है।
वास्तब में, देशमेम की भावना मनुष्य की सर्वश्रेष्ठ भावना है। इसके सामने किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत लाभ का कोई महत्त्व नहीं होता। यह एक ऐसा पवित्र व सात्विक भाव है, जो मनुष्य को निरते त्याग की प्रेरणा देता है, इसलिए कहा गया है-“जननी जन्मभूमिश्व स्वर्गादपि गरीयसी” अर्थात् जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। यही कारण है कि मनुष्य जहाँ रहता है, अनेक कठिनाइयों के बावजूद उसके प्रति उसका मोह कभी खत्म नहीं होता।
स्वदेश-प्रेम को किसी विशेष क्षेत्र एवं सीमा में नहीं बाँथा जा सकता। हमारे जिस कार्य से देश की उन्नति हो, वही स्वदेश-प्रेंम की सीमा में आता है। जाति-प्रथा, दहेज प्रथा, अंधविश्वास, छुआघूत इत्यादि कुरीतियाँ देश के विकास में बाचक हैं। हम इन्हें दूर करने में अपना योगदान कर देश-सेवा का फल प्राप्त कर सकते हैं। अशिक्षा, निर्धनता, बेरोजगारी, व्यभिचार एवं भ्रष्टाचार के विरुद्ध जंग छेड़कर हम अपने देश को प्रगति के पथ पर

अग्रसर कर सकते हैं। हम समय पर टैक्स का भुगतान कर देश की प्रगति में सहायक हो सकते हैं। इस प्रकार, किसान, मजदूर, शिक्षक, सरकारी कर्मयारी, चिकित्सक, सैनिक और अन्य सभी पेशेवर लोगों के साथ-साथ देश के हर नागरिक द्वारा अपने कर्त्तव्यों का समुचित रूप से पालन करना भी देशभक्ति ही है। नागरिकों में स्वदेश-प्रेम का अभाव राष्ट्रीय एकता में सबसे बड़ी बाधा के रूप में कार्य करता है। अपनी स्वतंत्रता की रक्षा एवं राष्ट्र की उन्नति के लिए राष्ट्रीय एकता परम आवश्यक है और राष्ट्रीय एकता बनाए रखना तब ही संभव है, जब हम देश के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे।

(ग) सत्संगति का मानव जीवन में महत्त्व
उत्तर :
परमात्मा की संपूर्ण सृष्टि में मानव ही श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि मानव विवेकशील, विचारशील तथा चितनशील प्राणी है। परमात्मा ने केवल मानव को ही बुद्धि अर्थांत चितन शक्ति प्रदान की है। वह बुरा-भला सभी प्रकार का विचार करने में समर्थ है। समाज में उच्च स्थान प्राप्त करने के लिए मानव को नैतिक शिक्षा व सत्संगति की आवश्यकता पड़ती है। मानव को बाल्यावस्था से ही माता-पिता द्वारा अच्छे संस्कार प्राप्त होने चाहिए, क्योंकि बचपन के संस्कारों पर ही मानव का संपूर्ण जीवन निर्भर रहता है।
सत् + संगति अर्थात् अच्छे व्यक्तियों के साथ रहना, उनके आचार-विचार एवं व्यवहार का अनुशासन करना ही ‘सत्संगति’ कहलाता है। सत्संगति मानव को ही नहीं अपितु पशु-पक्षी एवं निरीह जानवरों को मी दुभ्भवृत्ति छोड़कर सद्वृत्ति के लिए प्रेरित करती है।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह नित्य प्रति भिन्न-भिन्न प्रकृति के व्यक्तियों के संपर्क में आता है। वह जिस भी प्रकृति के व्यक्ति के संपर्क में आता है, उसी के गुण-दोषों तथा व्यवहार आदि को ग्रहण कर लेता है। अत: मानव को बुरे लोगों की संगति से बचना चाहिए तथा सत्संगति अपनानी चाहिए, क्योंकि सत्संगति ही मनुष्य को अच्छे संस्कार, उचित व्यवहार तथा उच्च विचार प्रदान करती है। यदि वह कुसंगति में पड़ गया, तो उसका संपूर्ण जीवन विनष्ट हो जाएगा। अतः सत्संगति की महती आवश्यकता है।
सत्संगति से मानय के आचार-विचार में परिवर्तन आता है और वह बुराई के मार्ग का त्याग कर सच्चे और अच्छे कर्मो में प्रवृत्त हो जाता है। सत्संगति ही उसके सच्चे मार्ग को प्रदर्शित करती है। उस पर चलता हुआ मानव देवताओं की श्रेणी में पहुँच जाता है। इस मार्ग पर चलने वाले के सामने धर्म रोड़ा बनकर नहीं आता है। अतः उसे किसी प्रकार के प्रलोभनों से विचलित नहीं होना चाहिए।
सत्संगति कुंदन है। इसके मिलने से काँच के समान मानव हीरे के समान चमक उठता है। अतः उन्नति का एकमात्र सोपान सत्संगति ही है। मानव को सज्जन पुरुषों के सत्संग में ही रहकर अपनी जीवन रूपी नौका समाज रूपी सागर से पार लगानी चाहिए। तभी वह आदर को प्राप्त कर सकता है तथा समस्त ऐश्वर्यों के सुख का उपभोग कर सकता है। इसीलिए कहा गया है “जहाँ सुमति तहुँ संपत्ति नाना।”

प्रश्न 8.
निम्नलिखित प्रश्नों को ध्यानपूर्वक पढ़कर लगभग 40 शब्दों में निर्देशानुसार उत्तर दीजिए। (2 × 2 = 4)

(क) “कहानी लेखन हेतु पात्र एवं चरित्रनचत्रण अत्यंत महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं।” स्पष्ट कीजिए।
अथवा
रेडियो नाटक एक श्रव्य विधा है। इसकी अवधि सीमित होती है। रेडियो नाटक में समय के अनुसार पात्रों की संख्या कितनी होनी चाहिए?
उत्तर :
कहानी का संचालन उसके पात्रों के द्वारा ही होता है। पात्रों के गुण-दोष को उनका चरित्रचित्रण कहा जाता है। प्रत्येक पात्र का अपना स्वरूप, स्वभाव और उद्देश्य होता है। पात्रों का अध्ययन कहानी की एक बहुत महत्वपूर्ण और बुनियादी शर्त है। कहानीकार के सामने पात्रों का स्वरूप जितना स्पष्ट होगा, उतनी ही आसानी उसे पात्रों का चरित्र-चित्रण करने और उसके संवाद लिखने में होगी। पात्रों का चरित्र-चित्रण कहानीकार द्वारा पात्रों के गुणों का बखान तथा दूसरे पात्रों के संवाद के माध्यम से किया जा सकता है। अतः कहा जा सकता है कि “कहानी लेखन हेतु पात्र एवं चरित्र-चित्रण अत्यंत महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं।”
अथवा
रेडियो नाटक में समय के अनुसार पात्रों की संख्या सीमित होनी चाहिए। 15 मिनट की अवधि वाले रेडियो नाटक में पात्रों की संख्या 5-6 हो सकती है। 30-40 मिनट की अवधि वाले नाटक में पात्रों की संख्या 8.12 हो सकती है। यदि एक घंटे या उससे अधिक की अवधि का रेडियो नाटक लिखना ही पड़ जाए, तो उसमें 15-20 भूमिकाएँ गढ़ी जा सकती हैं। एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि जब हम इन संख्याओं की बात कर रहे हैं, तो ये प्रमुख और सहायक भूमिकाओं की संख्या होती है, छोटे-मोटे किरदारों की गिनती इसमें नहीं की जाती।

(ख) अप्रत्याशित विषय का क्या अर्थ है? अप्रत्याशित विषयों पर लेखन से कौन-कौन से लाभ हैं?
अथवा
समाचार लेखन के विभिन्न चरणों में से शीर्षक तथा स्रोत पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
ऐसा विषय, जिस पर लेखन करने की कभी आशा न की गई हो, उस पर लेखन करना ही अप्रत्याशित विषयों पर लेखन कहलाता है। अप्रत्याशित विषयों पर लेखन के निम्नलिखित लाभ हैं
अप्रत्याशित लेखन लेखक की मौलिक रचना होती है। यह किसी मी रचना की नकल नहीं होती।
अप्रत्याशित लेखन से लेखन काँशल तथा अभिव्यक्ति काँशल का विकास होता है।
इससे भाषा पर अच्छी पकड़ हो जाती है।
इससे हम विषय को तार्किक रूप में सुसंबद्ध तरीके से लिख पाएँगे।
अथवा
1. शीर्षक
समाचार लेखन करते हुए सर्वप्रथम समाचार का शीर्षक देना चाहिए। शीर्षक में समाचार की मुख्य घटना (जिस घटना के संदर्भ में समाचार लिखा जा रहा है) का सांकेतिक उल्लेख रहना चाहिए। शीर्षक ऐसा होना चाहिए जो पाठक को सहज रूप से आकर्षित करे, समाचार का मूलभाव बताए और पाठक को अपनी रुथि के अनुसार समाचार खोजने में सहायक हो।

  • शीर्षक संक्षिप्त, सरल, सार्थक एवं स्पष्ट होना चाहिए।
  • शीर्षक को कमी भूतकाल में नहीं लिखना चाहिए।
  • शीर्षक में यदि नाम दिया जाना ज़रूरी हो तो महत्वपूर्ण तथा विख्यात व्यक्ति का दिया जाना चाहिए।
  • शीर्षक समाचार का ‘प्रवेश द्वार’ माना जाता है। शीर्षक की उपयुक्तता समाचार के महत्त्व को बढ़ाती है।

2. स्रोत
शीर्षक के पश्चात् समाचार के स्रोत का उल्लेख करना चाहिए; जैसे-

  • हमारे विशेष प्रतिनिधि द्वारा
  • व्यक्तिगत संवाददाता द्वारा
  • समाचार प्रदाता एजेंसियाँ
  • समाचार ब्यूरो

(स्रोत के अंतर्गत स्थान, व्यक्ति दोनों का उल्लेख करने से समाधार ज्यादा विश्वसनीय हो जाता है।)

प्रश्न 9.
निम्नलिखित प्रश्नों को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए 3 प्रश्नों में से किन्हीं 2 प्रश्नों के लगभग 60 शब्दों में उत्तर दीजिए। (3 × 2 = 6)

(क) ‘हताशा में आशा की किरण, युवा’ विषय पर एक आलेख लिखिए।
उत्तर :
वर्तमान समाज अन्याय, असमानता, ईर्थ्या, जातिभेद, वर्गभेद, वर्णभेद, सांप्रदायिकता, अष्टाचार, नारी के विरुद्ध हिंसा आदि कई बुराइयों से ग्रस्त है। चारों ओर अव्यवस्था एवं अराजकता का माहौल व्याप्त है। समाज में शिक्षा एवं रोजगार संबधी इतनी विषम समस्याएँ मौजूद हैं कि चारों तरफ़ निराशा का वातावरण दिखाई देता है। लोग अपने जीवन एवं भविष्य को लेकर आशंकित हैं। समाज में भ्रष्टाचार, अशिक्षा, निर्धनता, असमानता, शोषण, सांप्रदायिकता आदि अनेक ऐसी चुनौतियाँ उपस्थित हैं, जिनका सक्षम तरीके से सामना किए बिना एक स्वस्थ नय-समाज की रचना संभव नहीं है।
इस नव-निर्माण की जिम्मेदारी केवल युवावर्ग ही उठा सकता है। सामाजिक मूल्यों को बनाए रखना तथा समाज में सकारात्मक दृष्टिकोण उत्पन्न करना युवावर्ग द्वारा ही संभव है। शिक्षित युवार्ग ही संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर समाज को एक ऐसी दिशा प्रदान कर सकता है, जो सभी वर्गों के लोगों के लिए राहत पहुंचाने वाली हो। समाज के नव-निर्माण के कार्य में साहस एवं त्याग की आवश्यकता होगी, पग-पग पर भूलें होने की आशंका मौजूद रहेगी। अतः युवावर्ग को साहसी, त्याग के लिए तैयार, विवेकी, घैर्यवान एवं दूरदृष्टा होना पड़ेगा। यदि अपने लक्ष्य पर अपनी नजरें जमाकर युवावर्ग ने अपने समुचित कर्त्वव्यों को निभाया, तो दुनिया की कोई भी शक्ति समाज के नव-निर्माण को नहीं रोक सकती। धर्तमान समय में व्याप्त हताशा के माहौल में वही एकमात्र आशा की किरण है।

(ख) समाचार लेखन के ककार किन्हें कहा जाता है? संक्षेप में बताइए।
उत्तर :
किसी भी समाचार के छ: आधारभूत सवाल होते हैं, जिन्हें हिंदी में छ: ककार कहा जस्ता है तथा अंग्रेजी में पाँच डब्यू (w) एवं एक एच (H) कहा जाता है। किसी भी समाचार में छ: ककारों का होना सामान्यतया आवश्यक माना जाता है। ये ककार निम्न हैं
(i) क्या (What) अर्थात् क्या घटित हुआ ?
(ii) कब (When) अर्थात् घटना कब घटी?
(iii) कहाँ (Where) अर्थात् घटना किस स्थान पर घटी यानी किस स्थान से संबंधित है?
(iv) कौन (Who) अर्थात् घटना किससे संबधित है?
(v) क्यों (Why) अर्थात् घटना क्यों घटी?
(vi) कैसे (How) अर्थात् घटना कैसे घटित हुई?

(ग) बीट रिपोटिंग विशेष लेखन का भाग है। बीट रिपोटिंग तथा विशेषीकृत रिपोर्टिंग में क्या अंतर है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
बीट-रिपोर्टिंग व विशेषीकृत रिपोट्टिंग में मुख्य अंतर यह है कि अपनी बीट की रिपोर्टिंग के लिए संवाददाता को उस क्षेत्र के बारे में जानकारी और रुचि होना पर्याप्त होता है। बीट रिपोर्टर को सामान्यतया अपनी बीट से जुड़ी सामान्य खबरें ही लिखनी होती हैं। विशेषीकृत रिपोट्टैंग का तात्पर्य है कि संवाददाता सामान्य खबरों से आगे बढ़कर उस विशेष क्षेत्र या विषय से जुड़ी घटनाओं, मुद्दों और समस्याओं का सूक्षमता से विश्लेषण करें तथा पाठकों के समक्ष उनका अर्थ स्पष्ट करने का प्रयास करें। बीट कवर करने वाले रिपोर्टर को संवाददाता कहा जाता है, जबकि विशेषीकृत रिपोट्टिंग को विशेष संवाददाता कहा जाता है।

पाठ्य-पुस्तक आरोह भाग 2

प्रश्न 10.
निम्नलिखित प्रश्नों को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए 3 प्रश्नों में से किन्हीं 2 प्रश्नों के लगभग 60 शब्दों में उत्तर दीजिए। (3 × 2 = 6)

(क) ‘आत्मपरिचय’ में कवि के कथन “शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ” का विरोधाभास स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कवि का यह क्थन कि वह शीतल वाणी में आग लिए घूम रहा है, विरोधाभास की स्थिति को उत्पन्न करता है। इसके पीछे छिपा रहस्य यह है कि जब कवि अपने संघर्षों को कविता का रूप देता है, तो वह शीतल वाणी बन जाती है, जबकि उसका मन दुःखों की अगिन में जल रहा होता है। वह अपने दु:खों एवं विरोधों को कोमल शब्दों के माध्यम से अपनी रचनाओं में व्यक्त करता है। इसीलिए उसकी शीतल वाणी में भी असंतोष एवं व्याकुलता की आग छिपी रहती है।

(ख) कवि ने सूर्योदय से पहले आकाश की भंगिमा में आए परिवर्तनों को किस रूप में देखा है? ‘उषा’ पाठ के आथार पर उत्तर दीजिए।
उत्तर :
कवि ने प्रस्तुत कविता में प्रातःकालीन आकाश में होने वाले सूर्योदय का गतिशील चित्रण किया है। कवि आकाश में हो रहे परिवर्तनों को ग्रामीण उपमानों के द्वारा प्रस्तुत करता हुआ गतिशील शब्द-चित्र उपर्थित करता है। अंचकार के समाप्त होने पर भोर के नभ के नीले रंग में वैसी ही नमी होती है, जैसे राख से लीपा हुआ चौका (चूल्हा) अभी तक गीला हो। कलिमा के छँटने पर क्षितिज की लालिमा ऐसी लगती है, मानो किसी काली सिल (पत्थर) पर लाल केसर का लेप लगा दिया गया हो। इस प्रकार सूर्योदय से पहले का आकाश परिवर्तित हो रहा है।

(ग) कविता के संदर्भ में ‘बिना मुरझाए महकने के माने’ क्या होते हैं? (3)
उत्तर :
कविता को फूल के बहाने से बिलने की प्रक्रिया से जोड़ा गया है। कविता के माध्यम से हमारी भावनाएँ, हमारे विचार, हमारी कल्पनाएँ विकसित होती हैं। फूल से कविता ने खिलना भले ही सीखा हो, लेकिन कविता का जो विकास-क्रम है, उसे फूल नहीं जानता। एक निश्चित समय तक महकने के बाद फूल तो अपनी विकसित जीवन-लीला समाप्त करके चले जाते हैं, लेकिन कविता का स्वरूप अनंत काल तक बना रहता है। अतः कविता बिना मुरझाए अनंत काल. तक अपने काव्य रस से महकती रहती है।
यह निरंतर परत-दर-परत अर्थ की परते खोलती रहती है। शब्दों के माध्यम से भावों की सुगध एवं रस दिखेरती है, खिलकर अर्थाभिव्यक्ति कर जाती है। बिना मुरझाए खिलने के कारण ही कविता अनश्वर है। समी अपने अर्थ के अनुसार कविता को पढ़ते, समझते हैं और अपनी चेतना का आधार बनाते है। जो कविता वस्तुतः निरंतर युगों-युगों तक विकास पाती रहती है और बिना मुरझाए खिलती रहती है, वही कविता सार्थक एवं महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित प्रश्नों को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए 3 प्रश्नों में से किन्हीं 2 प्रश्नों के लगभग 40 शब्दों में उत्तर दीजिए। (2 × 2 = 4)

(क) अपंगता की पीड़ा दर्शाने के लिए दूरदर्शन वाले क्या करते हैं?
उत्तर :
अपंगता की पीड़ा दर्शाने के लिए दूरदर्शन वाले, दूरदर्शन के परदे पर एक फूली हुई आंख की बड़ी तस्वीर तथा अपाहिज व्यक्ति के होंठों की कसमसाहट अर्थात् कहने और न कहने की पीड़ा से उत्पन्न उस व्यक्ति के चेहरे की स्थिति को दिखाते हैं। वस्तुतः वे ऐसा पीड़ा को अधिक प्रदर्शित करने के लिए करते हैं।

(ख) ‘पतंग’ कविता के माध्यम से कवि ने बाल मनोविज्ञान का चित्रण किया है। कैसे?
उत्तर :
‘पतंग’ कविता में कवि ने बालसुलभ इच्चाओं तथा उमंगों का मनोरम चित्रण किया है। बच्चे अपनी पतंग की डोर के साथ-साथ स्वयं भी मानसिक रूप से आकाश की ऊँचाइयों तक पहुँच जाते हैं। उन्हें इस समय पूरी दुनिया सूक्ष्म प्रतीत होती है। कभी ये आकाश की ओर देखते-देखते ठोकर खाकर गिर पड़ते हैं, परंतु तुरंत ही उठ जाते हैं। फिर भी उनकी दृष्टि आकाश में उड़ने वाली पतंग पर ही अटकी रहती है। कनी वे पतंग की बोर के साथ-साथ छत के किनारे तक आकर द्भुक जाते हैं। ऐसे में उनके शरीर का संगीत ही उनकी रक्षा करता है, उन्हें नीचे गिरने से बचाता है। इस प्रकार, कवि ने पतंग के माध्यम से बाल मनोविज्ञान का अदभुत चित्रण किया है।

(ग) तुलसीदास ने समाज पर अपना क्षोभ किन शब्दों में व्यक्त किया है?
उत्तर :
तुलसीदास ने समाज के प्रति अपना क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा है कि चाहे कोई मुझे धूर्त कहे, अवधूत योगी कहे, राजपूत या जुलाहा कहे अर्थात् किसी भी वर्ग या जाति से जोड़कर देखे, मुझ़े उसकी कोई फिक्र नहीं है, क्योंकि न तो मुझे किसी की बेटी से अपने बेटे का विवाह करना है और न ही उसकी जाति-बिरादरी में शामिल होकर उसे बिगाइुना है। वास्तव में, तुलसीदास यहाँ जाति-पॉंति पर आधारित सामाजिक व्यवस्था के पोषकों पर गहरा व्यंग्य करते हैं।

प्रश्न 12.
निम्नलिखित प्रश्नों को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए 3 प्रश्नों में से किन्हीं 2 प्रश्नों के लगभग 60 शब्दों में उत्तर दीजिए। (3 × 2 = 6)

(क) ‘बाजार दर्शन’ पाठ के अनुसार, बाज़ार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या-क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
बाजार का जादू चढ़ने पर प्रभाव जिस प्रकार चुंबक लोहे को अपनी ओर आकर्षित करती है, उसी प्रकार बाजार का जादू चढ़ने पर मनुष्य उसकी ओर आकर्षित होता है। उसे लगता है कि यह सामान भी लूँ, वह सामान भी लूँ। उसे सभी वस्तुए अनिवार्य तथा आराम देने वाली लगती हैं। बाजार का जादू उतरने पर प्रभाव मनुष्य पर बाज़ार का जादू उतरने का प्रभाव यह पड़ता है कि फैंसी चीजों की अधिकता उसके आराम में मदद नहीं करतीं, बल्कि व्यवधान ही डालती हैं। उसे लगने लगता हैं कि इससे थोड़ी देर के लिए गर्व अवश्य महसूस होता है, पर अंततः यह सुविधाजनक नहीं है। इससे उसके अभिमान की भावना को और बढ़ावा मिलता है।

(ख) लेखिका को किस घटना के बाद लगा कि भक्तिन उसका साथ नहीं छोड़ना चाहती? ‘भवित्तन’ पाठ के आधार पर बताइए।
उत्तर :
युद्ध को देश की सीमा में बढ़ते हुए देखकर जब लोग परेशान हो उठे, तब भक्तिन के बेटी-दामाद उसके नाती को लेकर भक्तिन को बुलाने आए, तब भी वह लेखिका को छोड़ने का मन न बना पाई। वह उन सबकों देख आती है और रुपया भेज देती है, पर वह उनके साथ नहीं गई, क्योंकि उनके साथ जाने के लिए उसे लेखिका का साथ छोड़ना पड़ता, जो शायद भक्तिन के लिए जीवन के अंतिम समय तक संभव न था। इस घटना के बाद ही लेखिका को लगा कि भक्तिन उसका साथ नहीं छोड़ना चाहती।

(ग) ‘पहलवान की ढोलक’ कहानी में दंगल में विजयी होने के पश्चात् लुट्टन सिंह की जीवन-शैली में क्या परिवर्तन आ गया था?
उत्तर :
दंगल में विजयी होने के पश्वात् लुट्टन सिंह को राज पहलवान की पदवी मिल गई तथा राजदरबार का सम्माननीय प्राणी बन गया। मेलों में वह घुटने तक लंबा चोला पहने, मतवाले हाथी की तरह झुमता हुआ घूमता। दुकानदार उससे चुहलबाज़ी करते रहते थे। उसकी बुद्धि बच्चों जैसी हो गई थी। सीटी बजाता, औँखों पर रंगीन चश्मा लगाए और खिलौने से खेलता हुआ वह राजदरबार में आता। राजा साहब उसका बहुत ध्यान रखते थे और किसी को भी उससे लड़ने की आजा नहीं देते थे।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित प्रश्नों को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए 3 प्रश्नों में से किन्हीं 2 प्रश्नों के लगभग 40 शब्दों में उत्तर दीजिए। (2 × 2 = 4)

(क) भारत की जाति-प्रथा को आधुनिक समाज उचित नहीं मानता, क्यों? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
भारत की जाति-प्रथा को आघुनिक समाज उचित नहीं मानता, क्योंकि भारत भी जाति-प्रथा श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन करती है तथा विभाजित वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच का एहसास भी कराती है, यह सर्वथा अनुचित है। इससे देश में विषमता की भावना प्रबल होती है तथा भ्रष्टाचार फैलता है। ऐसा विश्व के किसी भी समाज में नहीं पाया जाता।

(ख) “पहले स्वयं दो तब देवता तुम्हें चौगुना-आठ गुना करके लौटाएँगे’ वाक्य भारतीय संस्कृति की किस विशेषता का परिचायक है? ‘काले मेघा पानी दे पाठ के आधार पर लिखिए।
उत्तर :
“पहले स्वयं दो तब देवता तुम्हें चौगुना-आठ गुना करके लौटाएँगे” वाक्य भारतीय संस्कृति की इस विशेषता का परिथायक है कि यहाँ लोग दान को धर्म का एक आवश्यक अंग मानते हैं। समाज में अनेक लोग अपाहिज तथा दरिद्र होते हैं। दान द्वारा ऐसे लोगों को सहायता मिल जाती है। इससे लाखों साधु-संत भी सहज रूप से जीवन-यापन करने में समर्थ होते हैं।

(ग) परिवर्तन प्रकृति का नियम है। इस परिवर्तनशील संसार में मनुष्य को समयानुसार परिवर्तन करते रहना चाहिए। इस तथ्य को शिरीष की पुरानी फलियों के माध्यम से कैसे प्रकट किया गया है?
उत्तर :
परिवर्तन प्रकृति का नियम है अतः मनुष्य को समयानुसार परिवर्तन करते रहना चाहिए। जो व्यक्ति समय के साथ चलते हैं, वे नए को स्वीकारते हुए जीवन पथ पर अग्रसर होते रहते हैं। वे समाज में अपनी पहचान बना पाते हैं। वे ही समाज में सम्मान प्राप्त करते हैं। इसके विपरीत जो व्यक्ति एक ही स्थान पर स्थिर रहते हैं, उन्हें दूसरे लोगों द्वारा धक्का दे दिया जाता है। ठीक उसी प्रकार जैसे पुराने शिरीष के फूलों को नए फूल व पत्ते मिलकर धक्का दे देते हैं तथा उस स्थान पर स्वर्य उग जाते हैं। अतः व्यक्ति को वृद्धावस्था में आदर-सम्मान प्राप्त करने हेतु नई पीढ़ी के विधारों तथा नए युग के परिवर्तन के अनुसार स्वयं में परिवर्तन कर लेना चाहिए।

पूरक पाठ्य-पुस्तक वितान भाग 2

प्रश्न 14.
निम्नलिखित प्रश्नों को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए 2 प्रश्नों में से किसी 1 प्रश्न का लगभग 60 शब्दों में उत्तर दीजिए। (1 × 4 = 4)
मुअनजो-दडो से प्राप्त जानकारी के आधार पर सिद्यु सभ्यता की सामाजिक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी के आधार पर यशोधर बाबू के मानसिक द्वंद्व की व्यंजक किन्हीं दो घटनाओं का उत्लेख कीजिए।
उत्तर :
सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से सिंधु सभ्यता के सामाजिक वातावरण को बहुत अनुशासित होने का अनुमान लगाया गया है। वहाँ का अनुशासन ताकत के बल पर नहीं था। नगर योजना, वास्तुशिल्प, मुहर, पानी या साफ़-सफ़ाई औैसी सामाजिक व्यवस्था में एकरूपता से यह अनुशासन प्रकट होता है। सिंधु सभ्यता में सुनियोजित नगर थे, पानी की निकासी व्यवस्था अच्छी थी। सड़के लंबी व चौड़ी थीं, कृष्वि भी की जाती थी, यातायात के साघन के रूप में बैलगाड़ी भी थी। हर नगर में मुद्रा, अनाज भंडार, स्नानगृह आदि थे तथा पक्की ईटों का प्रयोग होता था। सिंघु सभ्यता में प्रदर्शन या दिखावे की प्रवृत्ति नहीं है। यही विशेषता इसको अलग सांस्कृतिक धरातल पर खड़ा करती है। यह धरातल संसार की दूसरी सभी सभ्यताओं से पृथक् है।
अथवा
‘सिल्वर वैडिंग’ के केंद्रीय पात्र यशोधर पंत रहते तो वर्तमान में हैं, परंतु वे अपने अतीत से बाहर नहीं निकल पाते। वे कहते हैं कि उनकी तो परंपरा ही ऐसी है। वह पत्नी से कहते है, “जिस तरह तुमने बुक्यियाकाल में यह बगैर बाँह का ब्लाउज पहनना, यह रसोई से बाहर दाल-भात खा लेना, यह ऊँची हील वाली सैंडल पहनना और ऐसे ही पचासों काम अपनी बेटी की सलाह पर शुरू कर दिए हैं, मुझे तो वे ‘समहाउ इंप्रॉपर’ ही मालूम होते हैं। एनीवे, मैं तुम्हें ऐसा करने से रोक नहीं रहा। देयरफोर, तुम लोगों को भी मेरे जीने के ढंग पर कोई एतराज़ नहीं होना चाहिए।

“चंद्रदत्त तिवारी द्वारा बेटे की प्रशंसा सुनने पर प्रफुल्लित हुए यशोधर बाबू की मानसिक्ता को प्रकट करते हुए लेखक लिखता है कि “यशोधर बाबू ने बेटों की खरीदी हुई हर नई चीज़ के संदर्भ में यही टिप्पणी की हो कि ये क्या हुआ, समहाउ मेरी तो समझ में आता नहीं, इसकी क्या ज़रूरत थी। तथापि उन्हें कहीं इस बात से थोड़ी खुशी भी होती है कि इस चीज़ के आ जाने से उन्हें नए दौर के निश्चय ही गलत, मानकों के अनुसार बड़ा आदमी मान लिया जा रहा है” वे चाहते हैं कि उनके बच्चे उनके व्यवहार और रहन-सहन का अनुकरण करें, परंतु उनकी संतानें उन्हें रूढ़िवादी समझती हैं।
वे घर में आधुनिक सुदिधाओं की वस्तुएँ देखकर गर्व महसूस करते हैं, परंतु फिर भी उन्हें यह सब ‘समहाउ इंमॉपर’ लगता है। इन्हीं विपरीत परिस्थितियों में सामंजस्य स्थापित करने के म्रयास के कारण यशोधर बाबू के मन में अंतद्वद्व चलता रहता है।


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