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श्रम विभाजन और जाति-प्रथा Question Answers| NCERT Solutions Class 12 Chapter 15

 

CBSE Class 12 Hindi Aroh Bhag 2 Book Chapter 15 Shram Vibhaajan Aur Jaati-Pratha Question Answers

  

Shram Vibhaajan Aur Jaati-Pratha Class 12 – CBSE Class 12 Hindi Aroh Bhag-2 Chapter 15 Shram Vibhaajan Aur Jaati-Pratha Question Answers. The questions listed below are based on the latest CBSE exam pattern, wherein we have given NCERT solutions of the chapter, extract based questions, multiple choice questions, short and long answer questions.

 

सीबीएसई कक्षा 12 हिंदी आरोह भाग-2 पुस्तक पाठ 15  श्रम विभाजन और जाति-प्रथा प्रश्न उत्तर | इस लेख में NCERT की पुस्तक के प्रश्नों के उत्तर तथा महत्वपूर्ण प्रश्नों का व्यापक संकलन किया है।

 

श्रम विभाजन और जाति-प्रथा पाठ के पाठ्यपुस्तक पर आधारित प्रश्न – Textbook Based Questions

 

प्रश्न 1 – जाति प्रथा को श्रम विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे अंबेडकर के क्या तर्क हैं?

उत्तर – जाति प्रथा को श्रम विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे अंबेडकर जी के निम्नलिखित तर्क हैं – 

जाति प्रथा, कार्य के विभाजन के साथ-साथ लोगों का विभाजन भी करती हैं।

भारत की जाति प्रथा श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन करती हैं। ऐसा विभाजन विश्व के किसी भी समाज अथवा देश में नहीं देखा जाता है।

जाति प्रथा में श्रम विभाजन मनुष्य के जन्म के आधार पर निर्धारित होता है। जो बिलकुल सही नहीं है। 

व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार कार्य अथवा व्यवसाय चुनने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं।

जाति प्रथा में मनुष्य की कार्य क्षमता, उसकी कार्य कुशलता व उसकी रूचि का कोई महत्व नहीं होता है। 

जाति प्रथा में मनुष्य को वही कार्य करना पड़ता है जो उसका पैतृक पेशा होता है।

जाति प्रथा, व्यक्ति की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उसे उसका व्यवसाय बदलने की इजाजत नही देती, फिर चाहे वह भूखा ही मर जाए।

 

प्रश्न 2 – जाति प्रथा, भारतीय समाज में बेरोजगारी व भुखमरी का भी एक कारण कैसे बनती रही है? क्या यह स्थिति आज भी है?

उत्तर – जाति प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी और भुखमरी का एक प्रमुख कारण बनती रही है क्योंकि जाति प्रथा में व्यक्ति आजीवका के लिए क्या कार्य करेगा यह उसके जन्म से पहले ही तय कर दिया जाता है। इतना ही नहीं उसे, उसी कार्य को करते हुए जीवन यापन करने के लिए मजबूर किया जाता है। उसे अपना पेशा बदलने की अनुमति नहीं होती। फिर चाहे उसका पेशा उसे अच्छा जीवन न दे पाए या चाहे वह भूखा ही क्यों न मर जाए। आधुनिक समय में अत्याधुनिक मशीनों के आ जाने के बाद यह स्थिति प्रायः बन जाती है क्योंकि मशीनों के कारण कुछ पुराने व्यवसाय बंद होने की कगार पर आ जाते हैं। जिस कारण व्यक्ति को अपना व्यवसाय बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है। और अगर ऐसी परिस्थितियों में भी व्यक्ति को अपना व्यवसाय बदलने की स्वतंत्रता ना हो तो समाज में भुखमरी और बेरोजगारी तो बढ़नी स्वाभाविक है। परन्तु आज  स्थिति काफी हद तक बदल चुकी है। आज सरकारें दलित, निम्न व पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए कई योजनाएं चलाई बना रही हैं। उन्हें शिक्षित करके रूढ़िवादी विचारधारा से मुक्त करने की कोशिश की जा रही है व नौकरियों में भी आरक्षण दिया जा रहा है ताकि वो समाज में स्वतंत्रतापूर्वक कोई भी कार्य कर सकें। आज के समय में हर जाति, हर वर्ग का व्यक्ति अपनी रूचि के अनुसार अपना व्यवसाय अथवा नौकरी आदि चुनने के लिए स्वतंत्र है।

 

प्रश्न 3 – लेखक के मत से “दासता” की व्यापक परिभाषा क्या है?

उत्तर – लेखक के मत के अनुसार दासता या गुलामी का तात्पर्य सिर्फ कानूनी गुलामी नहीं है। बल्कि दासता का तात्पर्य यह है कि किसी व्यक्ति को उसकी रूचि के अनुसार कार्य करने की अनुमति न होना अथवा यह भी कहा जा सकता है कि जब किसी व्यक्ति को उसकी शैक्षणिक योग्यता व् कार्य कुशलता के अनुसार रोजगार या व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता ना हो और उसे समाज के द्वारा बनाए गए रूढ़िवादी नियम कानून के अनुसार अपना जीवन यापन करना पड़े तो, यह भी एक तरह की गुलामी ही है।

  

प्रश्न 4 – शारीरिक वंश परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार की दृष्टि से मनुष्यों में असमानता संभावित रहने के बावजूद अंबेडकर “समता” को एक व्यवहार्य सिद्धांत मानने का आग्रह क्यों करते हैं? इसके पीछे उनके क्या तर्क हैं?

उत्तर – शारीरिक वंश परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार की दृष्टि से मनुष्यों में असमानता संभावित रहने के बावजूद आंबेडकर समता को एक व्यवहार्य सिद्धांत मानने का आग्रह इसलिए करते हैं क्योंकि किसी भी वर्ग या समुदाय में पैदा होना किसी व्यक्ति के हाथ में नहीं होता। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी कार्य क्षमता के विकास करने का समान अवसर मिलना चाहिए। अंबेडकर जी शारीरिक वंश परंपरा व सामाजिक उत्तराधिकार के आधार पर असमान व्यवहार को अनुचित ठहराते हैं। उनका मानना यह है कि यदि समाज चाहता है कि उसे बेहतरीन से बेहतरीन नागरिक व् आदर्श व्यक्तित्व वाले व्यक्ति चाहिए, तो उसे समाज के प्रत्येक सदस्यों को बिना वर्ग की परवाह किए शुरू से ही समान अवसर व समान व्यवहार उपलब्ध करवाने चाहिए। समाज के सभी सदस्यों को उनकी रूचि के अनुसार उनका कार्यक्षेत्र चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए क्योंकि स्वतंत्रता,  भाईचारा, समानता किसी भी समाज की उन्नति के लिए सबसे आवश्यक तत्व हैं।

 

प्रश्न 5 – सही में अंबेडकर ने भावनात्मक समत्व की मानवीय दृष्टि के तहत जातिवाद का उन्मूलन चाहा है, जिसकी प्रतिष्ठा के लिए भौतिक स्थितियों और जीवन सुविधाओं का तर्क दिया है। क्या इससे आप सहमत हैं?

उत्तर – हाँ, हम लेखक की बात से सहमत हैं। उन्होंने भावनात्मक समत्व की मानवीय दृष्टि के तहत जातिवाद का उन्मूलन चाहा है जिसकी प्रतिष्ठा के लिए भौतिक स्थितियों और जीवन-सुविधाओं का तर्क दिया है। किसी भी समाज में भावनात्मक समत्व तभी आ सकती है जब समाज के सभी लोगों के पास समान भौतिक स्थितियों और जीवन जीने के लिए आवश्यक सुविधाऐं उपलब्ध होंगी। क्योंकि यदि दो ऐसे व्यक्तियों में प्रतियोगिता की जाए जिसमे एक व्यक्ति सभी भौतिक सुख-सुविधाओं में रहा हो और दूसरा अभावग्रस्त जीवन जी रहा हो, तो निश्चित तौर पर भौतिक सुख-सुविधाओं में रह रहा व्यक्ति  अभावग्रस्त जीवन जीने वाले व्यक्ति से  प्रतियोगिता में आगे निकल जाएगा। समाज में जाति-प्रथा का उन्मूलन तभी संभव है जब समता का भाव सभी में हो।समाज के सभी लोगों को शिक्षा, रोजगार व अपनी क्षमता का पूर्ण विकास करने का समान अवसर मिले। सभी को समान भौतिक सुख-सुविधाएं मिले। व्यक्ति को अपनी रुचि व कार्य कौशलता के आधार पर किसी भी कार्य क्षेत्र में कार्य करने की स्वतंत्रता मिले, तब असल में व्यक्ति के प्रयासों का मूल्यांकन किया जा सकता हैं।

 

प्रश्न 6 – आदर्श समाज के तीन तत्वों में से एक “भातृता” को रखकर लेखक ने अपने आदर्श समाज में स्त्रियों को भी सम्मिलित किया है अथवा नहीं? आप इस “भातृता” शब्द से कहां तक सहमत हैं? यदि नहीं तो आप क्या शब्द उचित समझेंगे/समझेंगी?

उत्तर – हम मानते हैं कि आदर्श समाज के तीन तत्वों में से एक “भातृता” को रखकर लेखक ने अपने आदर्श समाज में स्त्रियों को भी सम्मिलित किया है। 

 क्योंकि भातृता शब्द का अर्थ भाईचारा हैं और पाठ में यह शब्द किसी लिंग विशेष के लिए प्रयोग नहीं किया गया है। इसीलिए इस शब्द के अंदर महिलाएं भी समान रूप से सम्मिलित हैं। चूँकि स्त्री का स्त्री के प्रति प्रेम को भी तो बंधुत्व की भावना को ही प्रकट किया जाता है। इसलिए हम इस शब्द के पाठ में प्रयोग से पूरी तरह सहमत हैं। 

 

श्रम विभाजन और जाति-प्रथा पाठ पर आधारित अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर – (Important Question Answers)

 

 

प्रश्न 1 – जातिवाद के समर्थक जातिवाद को सही ठहराते हुए क्या तर्क देते हैं?

उत्तर – इस आधुनिक युग में भी जातिवाद को समर्थन देने वालों की कोई कमी नहीं है वे विभिन्न तर्कों के आधार पर जातिवाद का समर्थन करते रहते है। जातिवाद के उन समर्थकों द्वारा एक तर्क यह भी दिया जाता है कि आधुनिक सभ्य समाज में कार्यकुशलता के लिए कार्य विभाजन या कार्य का बंटवारा करना आवश्यक है और जातिप्रथा, कार्य विभाजन का ही दूसरा रूप है। इसीलिए उनके अनुसार जातिवाद में कोई बुराई नहीं है। 

 

प्रश्न 2 – जाति प्रथा, काम का बंटवारा करने के साथ-साथ लोगों का बंटवारा भी करती हैं। समाज के लिए क्या यह उचित है?

उत्तर – जाति प्रथा, काम का बंटवारा करने के साथ-साथ लोगों का बंटवारा भी करती हैं। यह भी सत्य है कि समाज के विकास के लिए कार्य का बंटवारा भी आवश्यक है। परन्तु समाज का विकास तभी संभव है जब यह कार्य विभाजन किसी जाति के आधार पर नहीं बल्कि व्यक्ति की योग्यता, रूचि और उसकी कार्य कुशलता व निपुणता के आधार पर हो। 

 

प्रश्न 3 – भारतीय समाज की जाति प्रथा की क्या विशेषता है?

उत्तर – भारतीय समाज की जाति प्रथा की यह विशेषता है कि यह कार्य के आधार पर श्रमिकों का विभाजन नहीं करती बल्कि समाज में पहले से ही विभाजित वर्गों अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, के आधार पर कार्य का विभाजन करती है। उदाहरण के तौर पर ब्राह्मण का बेटा वेद-पुराणों का ही अध्ययन करेगा तो क्षत्रिय का बेटा रक्षा का ही कार्य करेगा, लोहार का बेटा लोहार का ही कार्य करेगा। भले ही इन कार्यों को करने में उनकी रूचि हो या न हो। इस तरह की व्यवस्था विश्व के किसी भी समाज में नहीं दिखाई देती है।

 

प्रश्न 4 – भीमराव अंबेडकर जी के अनुसार जाति प्रथा को यदि श्रम विभाजन मान भी लिया जाए तो भी यह स्वाभाविक और उचित क्यों नहीं होगा?

उत्तर – भीमराव अंबेडकर जी के अनुसार जाति प्रथा को यदि श्रम विभाजन मान भी लिया जाए तो भी यह स्वाभाविक और उचित नहीं होगा। क्योंकि यह मनुष्य की रुचि के हिसाब से नहीं है। इसमें व्यक्ति जिस जाति या वर्ग में जन्म लेता हैं, उसे उसी के अनुसार कार्य करना होता हैं। भले फिर वह उसकी रूचि का कार्य हो या ना हो। अथवा वह किसी अन्य कार्य में ज्यादा निपूण हो और सबसे बड़ी बात तो यह है कि सब कुछ उसके माता-पिता के सामाजिक स्तर के हिसाब से बच्चे के जन्म लेने से पहले अर्थात उसके गर्भ से ही निर्धारित कर दिया जाता है कि उसका पेशा क्या होगा। यानि वह भविष्य में क्या कार्य करेगा। जातिप्रथा का सबसे बड़ा नकारात्मक पहलू यही है।

 

प्रश्न 5 – व्यक्ति को उसकी रूचि के आधार पर कार्य करने की स्वतंत्रता कैसे लाभदायक सिद्ध हो सकती है?

उत्तर – व्यक्ति को उसकी रूचि के आधार पर कार्य करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। जैसे अगर कोई ब्राह्मण का पुत्र सैनिक, वैज्ञानिक या इंजीनियर बनकर देश सेवा करना चाहता है तो उसे ऐसा करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। कहने का अभिप्राय यह है कि व्यक्ति को अपनी रूचि व क्षमता के हिसाब से अपना कार्य क्षेत्र चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। तभी देश का युवक वर्ग अपनी पूरी क्षमता से समाज व राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभा पाएंगे।

 

प्रश्न 6 – भीमराव अंबेडकर जी ने जातिप्रथा के क्या दोष बताए हैं?

उत्तर – भीमराव अंबेडकर जी जातिप्रथा के दोष बताते हुए कहते हैं कि जातिप्रथा, व्यक्ति के कार्यक्षेत्र को पहले से ही निर्धारित तो करती ही हैं। साथ ही साथ यह मनुष्य को जीवन भर के लिए उसी पेशे के साथ बंधे रहने को मजबूर भी करती है। फिर भले ही व्यक्ति की उस कार्य को करने में कोई रुचि हो या ना हो, या फिर उस कार्य से उसकी आजीविका चल रही हो या चल रही हो, उसका और उसके परिवार का भरण पोषण हो रहा हो या ना हो रहा हो। यहाँ तक कि उस कार्य से उसके भूखे मरने की नौबत भी आ जाए तो भी, वह अपना कार्य बदल कर कोई दूसरा कार्य नहीं सकता है। जबकि आधुनिक समय में कई बार प्रतिकूल परिस्थितियाँ होने के कारण अपना और अपने परिवार की सुख-सुविधाओं के लिए इंसान को अपना पेशा या कार्यक्षेत्र बदलने की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन अगर प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपना कार्यक्षेत्र बदलने की स्वतंत्रता ना हो तो उसके भूखे मरने की नौबत तो आयेगी ही। श्रम विभाजन की दृष्टि से भी जाति प्रथा में कई दोष हैं क्योंकि जातिप्रथा में श्रम विभाजन मनुष्य की इच्छा पर निर्भर नहीं होता। इसमें मनुष्य की व्यक्तिगत भावनाओं व व्यक्तिगत रूचि का कोई स्थान और महत्व भी नहीं होता। हर जाति या वर्ग के लोगों को उनके लिए पहले से ही निर्धारित कार्य करने पड़ते है। कई लोगों को अपने पूर्व निर्धारित या पैतृक कार्य में कोई रुचि नहीं होती, फिर भी उन्हें वो कार्य करने पड़ते है। क्योंकि जाति प्रथा के आधार पर वह कार्य उनके लिए पहले से ही निश्चित है और कोई अन्य कार्य या व्यवसाय चुनने की उन्हें कोई अनुमति नहीं है।

 

प्रश्न 7 – जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी व् भुखमरी बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाती है। कैसे?

उत्तर – हिंदू धर्म की जाति प्रथा किसी भी व्यक्ति को ऐसा कोई कार्यक्षेत्र चुनने की अनुमति नहीं देती है जो उसका पैतृक पेशा ना हो। भले ही वह किसी दूसरे कार्य को करने में अधिक निपुण और पारंगत क्यों ना हो। इसीलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि कार्यक्षेत्र को बदलने की अनुमति न देकर जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी व् भुखमरी बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाती है।

 

प्रश्न 8 – जब व्यक्ति अपनी इच्छा के विपरीत किसी कार्य को करता है तो उसका क्या परिणाम निकलता है?

उत्तर – जातिप्रथा में श्रम विभाजन मनुष्य की इच्छा पर निर्भर नहीं होता। हर जाति या वर्ग के लोगों को उनके लिए पहले से ही निर्धारित कार्य करने पड़ते है। कई लोगों को अपने पूर्व निर्धारित या पैतृक कार्य में कोई रुचि नहीं होती, फिर भी उन्हें वो कार्य करने पड़ते है। क्योंकि जाति प्रथा के आधार पर वह कार्य उनके लिए पहले से ही निश्चित है और कोई अन्य कार्य या व्यवसाय चुनने की उन्हें कोई अनुमति नहीं है। ऐसी स्थिति में जब व्यक्ति अपनी इच्छा के विपरीत किसी कार्य को करता है तो वह उस कार्य को पूरी लगन, कर्तव्यनिष्ठा और मेहनत से नहीं कर पाता और केवल कार्य को निपटाने की कोशिश करता है। और यह भी सत्य है कि जब व्यक्ति किसी कार्य को पुरे मन से अथवा लगन से नहीं करेगा तो, वह उस कार्य को पूरी कुशलता या निपुणता से कैसे कर सकता है। अतः इस बात से यह प्रमाणित होता है कि व्यक्ति की आर्थिक असुविधाओं के लिए भी जाति प्रथा हानिकारक है। क्योंकि यह मनुष्य की स्वाभाविक रुचि के अनुसार कार्य करने की अनुमति नहीं देती। और बेमन से किया गए कार्य में व्यक्ति कभी भी उन्नति नहीं कर सकता।

 

प्रश्न 9 – डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी की कल्पना का आदर्श समाज कैसा है?

उत्तर – डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी की कल्पना का आदर्श समाज स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे पर आधारित है। और किसी भी आदर्श समाज में इतनी गतिशीलता या लचीलापन तो होना ही चाहिए कि यदि समय के साथ समाज में कोई परिवर्तन करने की आवश्यकता हो तो वह परिवर्तन आसानी से किये जा सकें और यदि लोगों की भलाई के लिए कोई फैसला या नियम बनाया जाए तो उन फैसलों या नियमों का लाभ उच्च वर्ग से निम्न वर्ग तक के सभी व्यक्ति को एक समान रूप से मिल सके, जिससे समाज के सभी लोगों को उन्नति के समान अवसर मिलें। समाज में लोगों के बीच किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। क्योंकि जिस समाज में लोग एक दूसरे के हितों का ध्यान रखते है या एक दूसरे की भलाई के बारे में सोचते हैं। वह समाज निश्चित रूप से उन्नति करता है।

 

प्रश्न 10 – डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी के अनुसार लोकतंत्र को परिभाषित कीजिए?

उत्तर – डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी का मानना है कि समाज में भाईचारा दूध और पानी के समान होना चाहिए। जैसे पानी, दूध में मिलकर दूध जैसा ही हो जाता है और फिर उसे दूध से अलग करना संभव नही होता। ठीक उसी तरह समाज में भाईचारा होना चाहिए। जिस समाज में भाईचारा होता है और कोई भेदभाव नहीं  होता। सही अर्थों में वही लोकतंत्र कहलाता है। लेखक लोकतंत्र को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि लोकतंत्र सिर्फ देश चलाने के लिए एक शासन व्यवस्था नहीं हैं बल्कि लोकतंत्र एक ऐसा समाज है जहाँ लोग एक दूसरे का, अपने साथियों का सम्मान करें , उनके प्रति श्रद्धा भाव रखें, जहाँ हर किसी को अपना व्यवसाय या कार्यक्षेत्र चुनने की आजादी हो, वही लोकतंत्र है। 

 

प्रश्न 11 – लेखक के अनुसार दासता अर्थात गुलामी क्या है?

उत्तर – लेखक के अनुसार जब हमें कही भी आने-जाने, अपने जीवन की सुरक्षा करने, अपने कार्य के लिए आवश्यक औजार और सामग्री रखने की स्वतंत्रता मिल सकती है तो फिर हमें अपने मनपसंद का या रूचि के अनुसार कार्य चुनने की स्वतंत्रता क्यों नहीं मिल सकती। कुछ जाति प्रथा के समर्थक जीवन, शारीरिक सुरक्षा व संपत्ति के अधिकार की स्वतंत्रता को मान भी लेंगे लेकिन अपना व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता देने के लिए बिलकुल तैयार नहीं होंगे। इसका सीधा-सीधा मतलब हुआ कि लोगों को दासता अर्थात गुलामी में जकड़ कर रखना।

दासता अर्थात गुलामी केवल कानूनी पराधीनता को ही नहीं कहा जा सकता। जब कुछ लोगों को दूसरे लोगों के द्वारा निर्धारित व्यवहार और कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता हैं। यह भी एक तरह की गुलामी ही है। और जाति प्रथा में लोगों को अक्सर अपनी इच्छा के विपरीत दूसरे लोगों द्वारा बनाए हुए कानूनों को मानना पड़ता है। क्योंकि जातिप्रथा वाले समाज में प्रतिकूल परिस्थिति होने पर भी व्यक्ति अपना व्यवसाय या कार्यक्षेत्र नहीं बदल सकता। 

 

प्रश्न 12 – मनुष्य किन आधारों पर एक समान नहीं हो सकते?

उत्तर – सभी मनुष्य इन तीन बातों पर समान नहीं होते –

(1)  शारीरिक-वंश परंपरा अर्थात शारीरिक रंग-रूप, आकृति और जन्म के आधार पर यानि व्यक्ति किस धर्म या जाति में जन्म लेगा, इन पर किसी व्यक्ति का नियंत्रण नहीं होता। 

(2) सामाजिक उत्तराधिकार – कहने का तात्पर्य यह है कि किसी को उनके माता पिता से कितनी धन-सम्पत्ति मिलेगी या अन्य चीजें मिलेंगी, ये किसी के हाथ में नही हैं।

(3) मनुष्य के अपने प्रयत्न – प्रत्येक मनुष्य अपनी कुशलता के आधार पर अलग-अलग कसौटी पर प्रयत्न करता है। 

 

प्रश्न 13 – शारीरिक वंश परंपरा व सामाजिक उत्तराधिकार के आधार पर किसी के साथ असमान व्यवहार करना उचित क्यों नहीं है?

उत्तर – शारीरिक वंश परंपरा व सामाजिक उत्तराधिकार का अधिकार व्यक्ति के अपने हाथ में नहीं हैं, इसीलिए इस आधार पर किसी के साथ असमान व्यवहार करना उचित नहीं है। जाति, धर्म, संप्रदाय से ऊपर उठकर हमें मानव मात्र के प्रति समान व्यवहार रखना चाहिए। समाज में भेदभाव को छोड़ कर सभी लोगों को समान अवसर और अधिकार मिलने चाहिए। यह सब असंभव है किन्तु यही सत्य है।

यदि उत्तम व्यवहार के हक की कोई प्रतियोगिता हो तो वो लोग निश्चित ही आगे निकल जाएंगे जिन्होंने अच्छे कुल में जन्म लिया और जिन्हें विरासत में अथाह धन संपत्ति, व्यवसाय व प्रतिष्ठा मिली है। अगर हम केवल सुख-सुविधाओं से संपन्न लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करें या उन्हें ही अच्छा व्यवहार का हकदार मानें , तो हमारा यह निर्णय पक्षपाती कहा जाएगा। और यह निर्णय सुविधा संपन्नों के पक्ष में निर्णय देना जैसे होगा। इसीलिए कभी भी शारीरिक वंश परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार के आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहिए। यदि हमें समाज के सभी सदस्यों से अधिकतम योगदान प्राप्त करना है तो हमें सभी को सामान अवसर उपलब्ध कराने होंगे और सभी के साथ एक समान व्यवहार करना होगा। और प्रत्येक व्यक्ति को उसकी क्षमता का विकास करने के लिए प्रोत्साहित भी करना होगा। क्योंकि यह संभव है कि किसी व्यक्ति का प्रयत्न कम हो सकता है और किसी का ज्यादा लेकिन कम से कम हम सभी को समान प्रयत्न करने का अवसर तो उपलब्ध करवा सकते हैं।

 

श्रम विभाजन और जाति-प्रथा पाठ पर आधारित कुछ बहुविकल्पीय प्रश्न और उत्तर (Multiple Choice Questions)

 

प्रश्न 1 – प्राचीन काल में भारतीय समाज कितने वर्गों में बंटा था? 

(क) तीन वर्गों में 

(ख) पांच वर्गों में 

(ग) चार वर्गों में 

(घ) दो वर्गों में 

उत्तर – (ग) चार वर्गों में 

 

प्रश्न 2 – बाबा साहेब का आदर्श समाज किस पर आधारित है?

(क) स्वतंत्रता

(ख) समता 

(ग) भ्रातृता

(घ) उपरोक्त सभी 

उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी 

 

प्रश्न 3 – बाबासाहेब आंबेडकर ने किस प्रकार के समाज की कल्पना की है?

(क) आदर्श समाज

(ख) श्रम मुक्त समाज

(ग) जाति मुक्त समाज

(घ) रूढ़िवादी समाज

उत्तर – (क) आदर्श समाज

 

प्रश्न 4 – जातिप्रथा का सबसे बड़ा नकारात्मक पहलू क्या है?

(क) व्यक्ति को उसकी पसंद का पेशा चुनने की आजादी देना

(ख) व्यक्ति को उसकी पसंद का पेशा चुनने की आजादी न देना

(ग) व्यक्ति को परिवार का पेशा चुनने की आजादी न देना

(घ) व्यक्ति को परिवार का पेशा चुनने की आजादी  देना

उत्तर – (ख) व्यक्ति को उसकी पसंद का पेशा चुनने की आजादी न देना

 

प्रश्न 5 – लेखक के अनुसार श्रम विभाजन किस आधार पर होना चाहिए?

(क) व्यक्ति की योग्यता के आधार पर

(ख) व्यक्ति की रूचि के आधार पर

(ग) व्यक्ति की कार्य कुशलता व निपुणता के आधार पर

(घ) उपरोक्त सभी 

उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी

 

प्रश्न 6 – जाति प्रथा , श्रम विभाजन के साथ-साथ क्या करती हैं? 

(क) श्रमिक विभाजन

(ख) व्यापार विभाजन

(ग) कार्य विभाजन

(घ) धन विभाजन

उत्तर – (क) श्रमिक विभाजन

 

प्रश्न 7 – जाति प्रथा के कारण व्यक्ति को कौन सा पेशा जबरदस्ती अपनाना पड़ता है?

(क) व्यावसायिक पेशा

(ख) अपना निजी पेशा

(ग) पैतृक पेशा

(घ) आर्थिक पेशा

उत्तर – (ग) पैतृक पेशा

 

प्रश्न 8 – लेखक के अनुसार भारतीय समाज में बेरोजगारी और भुखमरी का क्या कारण है? 

(क) अशिक्षा 

(ख) जाति प्रथा

(ग) आर्थिक तंगी 

(घ) श्रम विभाजन 

उत्तर – (ख) जाति प्रथा

 

प्रश्न 9 – जाति प्रथा से समाज में क्या पैदा होता है?

(क) शिक्षित-अशिक्षित का भेदभाव

(ख) अमीर-गरीब का भेदभाव

(ग) लड़का-लड़की का भेदभाव

(घ) ऊँच-नीच का भेदभाव

उत्तर – (घ) ऊँच-नीच का भेदभाव

 

प्रश्न 10 – लेखक समाज के सभी सदस्यों को कौन सा अवसर प्रदान करने के पक्ष में है?

(क) आर्थिक क्षेत्र में आगे बढ़ने के समान अवसर

(ख) व्यापारिक क्षेत्र में आगे बढ़ने के समान अवसर

(ग) हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के समान अवसर

(घ) व्यावसायिक क्षेत्र में आगे बढ़ने के समान अवसर

उत्तर – (ग) हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के समान अवसर

 

प्रश्न 11 – लेखक के अनुसार समाज की कार्यकुशलता किस प्रकार बढ़ाई जा सकती है?

(क) सबको आर्थिक अवसर देकर

(ख) सबको समान अवसर देकर

(ग) सबको व्यापारिक अवसर देकर

(घ) सबको श्रमिक अवसर देकर

उत्तर – (ख) सबको समान अवसर देकर

 

प्रश्न 12 – अंबेडकर ने भाईचारे को किस मिश्रण की तरह माना है?

(क) दूध और दही 

(ख) नमक और पानी

(ग) दूध और पानी

(घ) दूध और चीनी 

उत्तर – (ग) दूध और पानी

 

प्रश्न 13 – लेखक के अनुसार मनुष्य किन बातों पर समान नहीं होते हैं?

(क) शारीरिक-वंश परंपरा

(ख) मनुष्य के अपने प्रयत्न

(ग) सामाजिक उत्तराधिकार 

(घ) उपरोक्त सभी 

उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी

 

प्रश्न 14 – कौन सा धर्म व्यक्ति को जाति प्रथा के अनुसार पैतृक काम अपनाने को मजबूर करता है?

(क) मुस्लिम धर्म

(ख) सिक्ख धर्म

(ग) हिंदू धर्म

(घ) ईसाई धर्म

उत्तर – (ग) हिंदू धर्म

 

प्रश्न 15 – लेखक ने आदर्श समाज में कितने तत्वों की चर्चा की है?

(क) तीन

(ख) दो 

(ग) पाँच 

(घ) चार 

उत्तर – (क) तीन

 

प्रश्न 16 – आदर्श समाज में परिवर्तन का लाभ किसे प्राप्त होता है?

(क) समाज के सभी उच्च वर्ग को

(ख) समाज के सभी लोगों को

(ग) समाज के सभी निम्न वर्ग को

(घ) समाज के सभी समृद्ध लोगों को

उत्तर – (ख) समाज के सभी लोगों को

 

प्रश्न 17 – श्रम के परंपरागत तरीकों में परिवर्तन होने का कारण क्या है? 

(क) परंपरागत तकनीक

(ख) कृत्रिम तकनीक

(ग) आधुनिक तकनीक

(घ) सामूहिक तकनीक

उत्तर – (ग) आधुनिक तकनीक

 

प्रश्न 18 – श्रम विभाजन किस पर आधारित होना चाहिए? 

(क) व्यक्ति की व्यक्तिगत अरूचि और तर्क क्षमता पर

(ख) व्यक्ति की व्यक्तिगत रूचि और कार्य क्षमता पर

(ग) व्यक्ति की व्यक्तिगत दृष्टिकोण और निर्णय क्षमता पर

(घ) उपरोक्त सभी 

उत्तर – (ख) व्यक्ति की व्यक्तिगत रूचि और कार्य क्षमता पर

 

प्रश्न 19 – मनुष्य को उसकी कार्यकुशलता व दक्षता प्रमाणित करने के लिए क्या आवश्यक हैं?

(क) स्वतंत्रता

(ख) कार्य कुशलता 

(ग) आदर्श व्यक्तित्व 

(घ) श्रम विभाजन 

उत्तर – (क) स्वतंत्रता

 

प्रश्न 20 – लेखक के अनुसार काल्पनिक जगत की वस्तु क्या है?

(क) असमानता या असमता

(ख) समानता या समता

(ग) निर्णय कुशलता 

(घ) आदर्श व्यक्तित्व 

उत्तर – (ख) समानता या समता

 

श्रम विभाजन और जाति-प्रथा पाठ के सार-आधारित प्रश्न Extract Based Questions

सारआधारित प्रश्न बहुविकल्पीय किस्म के होते हैं, और छात्रों को पैसेज को ध्यान से पढ़कर प्रत्येक प्रश्न के लिए सही विकल्प का चयन करना चाहिए। (Extract-based questions are of the multiple-choice variety, and students must select the correct option for each question by carefully reading the passage.)

 

1 –

यह विडंबना की ही बात है, कि इस युग में भी ‘जातिवाद’ के पोषकों की कमी नहीं हैं। इसके पोषक कई आधारों पर इसका समर्थन करते हैं। समर्थन का एक आधार यह कहा जाता है, कि आधुनिक सभ्य समाज ‘कार्य-कुशलता’ के लिए श्रम विभाजन को आवश्यक मानता है, और चूँकि जाति-प्रथा भी श्रम विभाजन का ही दूसरा रूप है इसलिए इसमें कोई बुराई नहीं है। इस तर्क के संबंध में पहली बात तो यही आपत्तिजनक है, कि जाति-प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक-विभाजन का भी रूप लिए हुए है। श्रम विभाजन, निश्चय ही सभ्य समाज की आवश्यकता है, परंतु किसी भी सभ्य समाज में श्रम विभाजन की व्यवस्था श्रमिकों का विभिन्न वर्गों में अस्वाभाविक विभाजन नहीं करती। भारत की जाति-प्रथा की एक और विशेषता यह है कि यह श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन ही नहीं करती बल्कि विभाजित विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच भी करार देती है, जो कि विश्व के किसी भी समाज में नहीं पाया जाता।

 

प्रश्न 1 – लेखक के अनुसार विडंबना क्या है?

(क) आधुनिक युग में कुछ लोग कार्य-कुशलता के पोषक हैं

(ख) आधुनिक युग में कुछ लोग जातिवाद के पोषक हैं

(ग) आधुनिक युग में कुछ लोग श्रम विभाजन के पोषक हैं

(घ) आधुनिक युग में कुछ लोग श्रमिक-विभाजन के पोषक हैं

उत्तर – (ख) आधुनिक युग में कुछ लोग जातिवाद के पोषक हैं

 

प्रश्न 2 – जातिवाद के पोषक किन आधारों पर इसका समर्थन करते हैं?

(क) आधुनिक सभ्य समाज ‘कार्य-कुशलता’ के लिए श्रम विभाजन को आवश्यक है

(ख) जाति-प्रथा भी श्रम विभाजन का ही दूसरा रूप है इसलिए इसमें कोई बुराई नहीं है

(ग) केवल (ख) 

(घ) (क) और (ख) दोनों 

उत्तर – (घ) (क) और (ख) दोनों 

 

प्रश्न 3 – लेखक जातिवाद के समर्थकों द्वारा दिए गए तर्कों में क्या आपत्ति दर्शाता है?

(क) कि जाति-प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक-विभाजन का भी रूप लिए हुए है

(ख) कि किसी भी सभ्य समाज में श्रम विभाजन की व्यवस्था श्रमिकों का विभिन्न वर्गों में अस्वाभाविक विभाजन नहीं करती

(ग) कि जाति-प्रथा श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन ही नहीं करती बल्कि विभाजित विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच भी करार देती है

(घ) उपरोक्त सभी 

उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी

 

प्रश्न 4 – लेखक ने भारत में जातिप्रथा की क्या विशेषता बताई है?

(क) यह श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन ही नहीं करती बल्कि विभाजित विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच भी करार देती है

(ख) यह श्रमिकों का स्वाभाविक विभाजन करती है, जो कि विश्व के किसी भी समाज में नहीं पाया जाता

(ग) यह श्रमिकों का स्वाभाविक विभाजन करती जो विभाजित विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे के प्रति सम्मान देती है

(घ) इनमें से कोई नहीं 

उत्तर – (क) यह श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन ही नहीं करती बल्कि विभाजित विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच भी करार देती है

 

प्रश्न 5 – आधुनिक सभ्य समाज क्या आवश्यक मानता है?

(क) शीघ्र कार्य समाप्ति के लिए श्रम विभाजन 

(ख) कार्य-कुशलता के लिए श्रम विभाजन 

(ग) कार्य में योग्यता के लिए श्रम विभाजन 

(घ) समाज में समानता के लिए श्रम विभाजन 

उत्तर – (ख) कार्य-कुशलता के लिए श्रम विभाजन 

 

2 –

जाति-प्रथा को यदि श्रम विभाजन मान लिया जाए, तो यह स्वाभाविक विभाजन नहीं है, क्योंकि यह मनुष्य की रूचि पर आधारित नहीं है। कुशल व्यक्ति या सक्षम-श्रमिक-समाज का निर्माण करने के लिए यह आवश्यक है कि हम व्यक्तियों की क्षमता इस सीमा तक विकसित करें, जिससे वह अपना पेशा या कार्य का चुनाव स्वयं कर सके। इस सिद्धांत के विपरीत जाति-प्रथा का दूषित सिद्धांत यह है कि इससे मनुष्य के प्रशिक्षण अथवा उसकी निजी क्षमता का विचार किए बिना, दूसरे ही दृष्टिकोण जैसे माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार, पहले से ही अर्थात गर्भधारण के समय से ही मनुष्य का पेशा निर्धारित कर दिया जाता है। जाति-प्रथा पेशे का दोषपूर्ण पूर्वनिर्धारण ही नहीं करती बल्कि मनुष्य को जीवन-भर के लिए एक पेशे में बाँध भी देती है। भले ही पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने के कारण वह भूखों मर जाए। आधुनिक युग में यह स्थिति प्रायः आती है, क्योंकि उद्योग-धंधों की प्रक्रिया व तकनीक में निरंतर विकास और कभी-कभी अकस्मात परिवर्तन हो जाता है, जिसके कारण मनुष्य को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है और यदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपना पेशा बदलने की स्वतंत्रता न हो, तो इसके लिए भूखों मरने के अलावा क्या चारा रह जाता है? हिन्दू धर्म की जाति प्रथा किसी भी व्यक्ति को ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती है, जो उसका पैतृक पेशा न हो, भले ही वह उसमें पारंगत हो। इस प्रकार पेशा परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति-प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है।

 

प्रश्न 1 – जाति-प्रथा को यदि श्रम विभाजन मान लिया जाए, तो यह स्वाभाविक विभाजन क्यों नहीं है? 

(क) क्योंकि यह मनुष्य की रूचि पर आधारित है

(ख) क्योंकि यह मनुष्य की रूचि पर आधारित नहीं है

(ग) क्योंकि यह मनुष्य की कार्य-क्षमता पर आधारित है

(घ) क्योंकि यह मनुष्य की कार्य-कुशलता पर आधारित है

उत्तर – (ख) क्योंकि यह मनुष्य की रूचि पर आधारित नहीं है

 

प्रश्न 2 – कुशल व्यक्ति या सक्षम-श्रमिक-समाज का निर्माण करने के लिए क्या आवश्यक है?  

(क) कि हम व्यक्तियों की क्षमता इस सीमा तक विकसित करें, जिससे वह अपना पेशा या कार्य का चुनाव स्वयं कर सके

(ख) कि हम व्यक्तियों की क्षमता इस सीमा तक विकसित करें, जिससे वह अपना पैतृक पेशा अच्छे से चला सके

(ग) कि हम व्यक्तियों की क्षमता इस सीमा तक विकसित करें, जिससे वह अपना कार्य ईमानदारी से कर सके

(घ) उपरोक्त सभी 

उत्तर – (क) कि हम व्यक्तियों की क्षमता इस सीमा तक विकसित करें, जिससे वह अपना पेशा या कार्य का चुनाव स्वयं कर सके

 

प्रश्न 3 – जाति-प्रथा का दूषित सिद्धांत क्या है? 

(क) उसके पेशे का निर्धारण उसके माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार कर दिया जाता है

(ख) मनुष्य के प्रशिक्षण अथवा उसकी निजी क्षमता पर विचार नहीं किया जाता  

(ग) गर्भधारण के समय से ही मनुष्य का पेशा निर्धारित कर दिया जाता है

(घ) उपरोक्त सभी 

उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी 

 

प्रश्न 4 – आधुनिक युग में व्यक्ति को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता क्यों पड़ सकती है?

(क) क्योंकि उद्योग-धंधों का स्वरूप बदलता रहता है

(ख) क्योंकि तकनीक के विकास से किसी भी व्यवसाय का रूप बदल जाता है

(ग) क्योंकि आधुनिक मशीनों के कारण व्यवसाय का रूप बदल जाता है

(घ) उपरोक्त सभी 

उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी

 

प्रश्न 5 – भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण क्या बनी हुई है?

(क) जाति-प्रथा 

(ख) श्रम विभाजन 

(ग) श्रमिक विभाजन 

(घ) कार्य कुशलता 

उत्तर – (क) जाति-प्रथा

 

3 – 

मेरे द्वारा जाति-प्रथा की आलोचना सुनकर आप लोग मुझसे यह प्रश्न पूछना चाहेंगे कि यदि मैं जातियों के विरुद्ध हूँ, तो फिर मेरी दृष्टि में आदर्श-समाज क्या है? ठीक है, यदि ऐसा पूछेंगे, तो मेरा उत्तर होगा कि मेरा आदर्श-समाज स्वतंत्रता, समता, भ्रातृता पर आधारित होगा। क्या यह ठीक नहीं है, भ्रातृता अर्थात भाईचारे में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? किसी भी आदर्श-समाज में इतनी गातिशीलता होनी चाहिए जिससे कोई भी वांछित परिवर्तन समाज के एक छोर से दूसरे तक संचारित हो सके। ऐसे समाज के बहुविधि हितों में सबका भाग होना चाहिए तथा सबको उनकी रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए। सामाजिक जीवन में अबाध संपर्क के अनेक साधन व अवसर उपलब्ध रहने चाहिए। तात्पर्य यह कि दूध-पानी के मिश्रण की तरह भाईचारे का यही वास्तविक रूप है, और इसी का दूसरा नाम लोकतंत्र है। क्योंकि लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति ही नहीं है, लोकतंत्र मूलतः सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है। इनमें यह आवश्यक है कि अपने साथियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान का भाव हो। 

 

प्रश्न 1 – लेखक की दृष्टि में आदर्श-समाज क्या है?

(क) समाज स्वतंत्रता पर आधारित

(ख) भ्रातृता पर आधारित

(ग) समता पर आधारित

(घ) उपरोक्त सभी 

उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी 

 

प्रश्न 2 – लेखक किस समाज को आदर्श मानता है? 

(क) जिसमें स्वतंत्रता, समानता व भाईचारा हो

(ख) जिसमें इतनी गतिशीलता हो कि सभी लोग एकसाथ सभी परिवर्तनों को ग्रहण कर सकें

(ग) ऐसे समाज में सभी के सामूहिक हित होने चाहिएँ तथा सबको सबकी रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए।

(घ) उपरोक्त सभी 

उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी 

 

प्रश्न 3 – किसके मिश्रण को भाईचारे का वास्तविक रूप माना है?

(क) दूध-पानी 

(ख) दूध-चीनी  

(ग) नमक-पानी 

(घ) दूध-लस्सी 

उत्तर – (क) दूध-पानी 

 

प्रश्न 4 – लोकतंत्र क्या है?

(क) लोकतंत्र मूलतः सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति है

(ख) लोकतंत्र मूलतः समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है

(ग) केवल (ख )

(घ) (क) और (ख) दोनों 

उत्तर – (घ) (क) और (ख) दोनों 

 

प्रश्न 5 – लोकतंत्र के लिए क्या आवश्यक है? 

(क) अपने साथियों के प्रति क्रोध व् ईर्ष्या का भाव 

(ख) अपने साथियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान का भाव 

(ग) अपने साथियों के प्रति  भक्ति व् आध्यात्म का भाव 

(घ) उपरोक्त सभी 

उत्तर – (ख) अपने साथियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान का भाव 

 

4 – 

जाति-प्रथा के पोषक, जीवन, शारीरिक-सुरक्षा तथा संपत्ति के अधिकार की स्वतंत्रता को तो स्वीकार कर लेंगे, परंतु मनुष्य के सक्षम एवं प्रभावशाली प्रयोग की स्वतंत्रता देने के लिए जल्दी तैयार नहीं होंगे, क्योंकि इस प्रकार की स्वतंत्रता का अर्थ होगा अपना व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता किसी को नहीं है, तो उसका अर्थ उसे ‘दासता’ में जकड़कर रखना होगा, क्योंकि ‘दासता’ केवल कानूनी पराधीनता को ही नहीं कहा जा सकता। ‘दासता’ में वह स्थिति भी सम्मिलित है जिससे कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों के द्वारा निर्धारित व्यवहार एवं कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है। यह स्थिति कानूनी पराधीनता न होने पर भी पाई जा सकती है। उदाहरणार्थ, जाति प्रथा की तरह ऐसे वर्ग होना संभव है, जहाँ कुछ लोगों की अपनी इच्छा के विरुद्ध पेशे अपनाने पड़ते है। अब आइए समता पर विचार करें। क्या ‘समता’ पर किसी की आपत्ति हो सकती है। फ्रांसीसी क्रान्ति के नारे में ‘समता’ शब्द ही विवाद का विषय रहा है। ‘समता’ के आलोचक यह कह सकते हैं कि सभी मनुष्य बराबर नहीं होते। और उनका यह तर्क वज़न भी रखता है। लेकिन तथ्य होते हुए भी यह विशेष महत्त्व नहीं रखता। क्योंकि शाब्दिक अर्थ में ‘समता’ असंभव होते हुए भी यह नियामक सिद्धांत है। मनुष्यों की क्षमता तीन बातों पर निर्भर रहती है। (1) शारीरिक वंश परंपरा, )2) सामाजिक उत्तराधिकार अर्थात सामाजिक परंपरा के रूप में माता-पिता की कल्याण कामना, शिक्षा तथा वैज्ञानिक ज्ञानार्जन आदि, सभी उपलब्धियाँ जिनके कारण सभ्य समाज, जंगली लोगों की अपेक्षा विशिष्टता प्राप्त करता है, और अंत में (3) मनुष्य के अपने प्रयत्न। 

 

प्रश्न 1 – जाति-प्रथा के पोषक किस बात के लिए तैयार नहीं होंगे?

(क) जीवन-सुरक्षा के अधिकार की स्वतंत्रता देने के लिए 

(ख) शारीरिक-सुरक्षा के अधिकार की स्वतंत्रता देने के लिए 

(ग) मनुष्य के सक्षम एवं प्रभावशाली प्रयोग की स्वतंत्रता देने के लिए 

(घ) संपत्ति के अधिकार की स्वतंत्रता को देने के लिए 

उत्तर – (ग) मनुष्य के सक्षम एवं प्रभावशाली प्रयोग की स्वतंत्रता देने के लिए 

 

प्रश्न 2 – अपना व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता किसी को नहीं है, इसका अर्थ क्या होगा?

(क) दासता में जकड़कर रखना

(ख) अधिकारों में जकड़कर रखना

(ग) स्वतंत्रता में जकड़कर रखना

(घ) प्रसिद्धि में जकड़कर रखना

उत्तर – (क) दासता में जकड़कर रखना

 

प्रश्न 3 – ‘समता’ के आलोचक क्या कह सकते हैं? 

(क) कि सभी मनुष्य बराबर होते हैं 

(ख) कि सभी मनुष्य बराबर नहीं होते

(ग) कि सभी मनुष्य बराबर हकदार होते हैं 

(घ) कि सभी मनुष्य बराबर स्वतन्त्र होना चाहते हैं 

उत्तर – (ख) कि सभी मनुष्य बराबर नहीं होते 

 

प्रश्न 4 – मनुष्यों की क्षमता किन बातों पर निर्भर रहती है? 

(क) शारीरिक वंश परंपरा

(ख) सामाजिक उत्तराधिकार अर्थात सामाजिक परंपरा

(ग) मनुष्य के अपने प्रयत्न

(घ) उपरोक्त सभी 

उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी

 

प्रश्न 5 – सामाजिक उत्तराधिकार क्या हैं?  

(क) सामाजिक परंपरा के रूप में माता-पिता की कल्याण कामना करना 

(ख) शिक्षा तथा वैज्ञानिक ज्ञानार्जन

(ग) सभी उपलब्धियाँ जिनके कारण सभ्य समाज, जंगली लोगों की अपेक्षा विशिष्टता प्राप्त करता है

(घ) उपरोक्त सभी 

उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी 

 

5 – 

व्यक्ति विशेष के दृष्टिकोण से, असमान प्रयत्न के कारण, असमान व्यवहार को अनुचित नहीं कहा जा सकता। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता का विकास करने का पूरा प्रोत्साहन देना सर्वथा उचित है। परंतु यदि मनुष्य प्रथम दो बातों में असमान है, तो क्या इस आधार पर उनके साथ भिन्न व्यवहार उचित हैं? उत्तम व्यवहार के हक की प्रतियोगिता में वे लोग निश्चय ही बाजी मार ले जाएँगे, जिन्हें उत्तम कुल, शिक्षा, पारिवारिक ख्याति, पैतृक संपदा तथा व्यवसायिक प्रतिष्ठा का लाभ प्राप्त है। इस प्रकार पूर्ण सुविधा संपन्नों को ही ‘उत्तम व्यवहार’ का हकदार माना जाना वास्तव में निष्पक्ष निर्णय नहीं कहा जा सकता। क्योंकि यह सुविधा संपन्नों के पक्ष में निर्णय देना होगा। अतः न्याय का तकाजा यह है कि जहाँ हम तीसरे (प्रयासों की असमानता, जो मनुष्यों के अपने वश की बात है) आधार पर मनुष्यों के साथ असमान व्यवहार को उचित ठहराते हैं, वहाँ प्रथम दो आधारों (जो मनुष्य के अपने वश की बातें नहीं हैं) पर उनके साथ असमान व्यवहार नितांत अनुचित है। और हमें ऐसे व्यक्तियों के साथ यथासंभव समान व्यवहार करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, समाज की यदि अपने सदस्यों से अधिकतम उपयोगिता प्राप्त करनी है, तो यह तो संभव है, जब समाज के सदस्यों को आरंभ से ही समान अवसर एवं समान व्यवहार उपलब्ध कराए जाए।

 

प्रश्न 1 – व्यक्ति विशेष के दृष्टिकोण से, असमान प्रयत्न के कारण, कैसे व्यवहार को अनुचित नहीं कहा जा सकता?

(क) समान व्यवहार को

(ख) उचित व्यवहार को

(ग) असमान व्यवहार को

(घ) उपरोक्त सभी 

उत्तर – (ग) असमान व्यवहार को

 

प्रश्न 2 – उत्तम व्यवहार के हक की प्रतियोगिता में कौन से लोग निश्चय ही बाजी मार ले जाएँगे? 

(क) जिन्हें उत्तम कुल व्  शिक्षा का लाभ प्राप्त है

(ख) जिन्हें पारिवारिक ख्याति व् पैतृक संपदा का लाभ प्राप्त है

(ग) जिन्हें पैतृक संपदा तथा व्यवसायिक प्रतिष्ठा का लाभ प्राप्त है

(घ) उपरोक्त सभी 

उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी 

 

प्रश्न 3 – गद्यांश के अनुसार सर्वथा क्या उचित है?

(क) प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता का विकास न करने का

(ख) प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता का विकास करने का

(ग)  प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सुरक्षा करने का

(घ)  प्रत्येक व्यक्ति को अपने  व्यवसाय का विकास करने का

उत्तर – (ख) प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता का विकास करने का

 

प्रश्न 4 – पूर्ण सुविधा संपन्नों को ही ‘उत्तम व्यवहार’ का हकदार माना जाना वास्तव में निष्पक्ष निर्णय नहीं कहा जा सकता। क्यों? 

(क) क्योंकि यह सुविधा संपन्नों के पक्ष में निर्णय देना होगा

(ख) क्योंकि यह सुविधा संपन्नों के विपक्ष में निर्णय देना होगा। 

(ग) क्योंकि यह सुविधा संपन्नों के विरुद्ध में निर्णय देना होगा। 

(घ) क्योंकि यह सुविधा संपन्नों के बारे में निर्णय न देना होगा। 

उत्तर – (क) क्योंकि यह सुविधा संपन्नों के पक्ष में निर्णय देना होगा

 

प्रश्न 5 – समाज को यदि अपने सदस्यों से अधिकतम उपयोगिता प्राप्त करनी है, तो क्या संभव है? 

(क) जब समाज के सदस्यों को आरंभ से ही समान अवसर उपलब्ध कराए जाए

(ख) जब समाज के सदस्यों को आरंभ से ही समान व्यवहार उपलब्ध कराए जाए।

(ग) केवल (क) 

(घ) (क) और (ख) दोनों 

उत्तर – (घ) (क) और (ख) दोनों

 

 

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