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रुबाइयाँ पाठ सार, व्याख्या Class 12 Chapter 8

 

 

CBSE Class 12 Hindi Aroh Bhag 2 Book Chapter 8 रुबाइयाँ Summary, Explanation 

 

इस पोस्ट में हम आपके लिए CBSE Class 12 Hindi Aroh Bhag 2 Book के Chapter 8 में फ़िराक गोरखपुरी द्वारा रचित कविता रुबाइयाँ का पाठ सार, व्याख्या और  कठिन शब्दों के अर्थ लेकर आए हैं। यह सारांश और व्याख्या आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे आप जान सकते हैं कि इस कविता का विषय क्या है। इसे पढ़कर आपको मदद मिलेगी ताकि आप इस कविता के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें। Firaq Gorakhpuri Poem Rubaiyan Summary, Explanation, Difficult word meanings of CBSE Class 12 Hindi Aroh Bhag-2 Chapter 8.

 

रुबाइयाँ कविता का पाठ सार (Summary) 

 

फ़िराक गोरखपुरी की ‘रुबाइयाँ’ में हिंदी का एक घरेलू रूप दिखता है। इस रचना में कवि ने वात्सल्य वर्णन किया है। एक माँ अपने घर के आंगन में अपने चांद के टुकड़े को अपने हाथों पर झूला झूलती है तो कभी उसे प्यार से गोद में भर लेती है। कभी-कभी वह माँ उस बच्चे को हवा में उछाल भी लेती हैं। माँ के इस प्यार-दुलार भरे खेल से बच्चा भी बहुत खुश होता है और खिलखिला कर हंस देता है। माँ अपने छोटे बच्चे को हिलते-डुलते साफ-सुथरे पानी से नहलाती है। नहाने से उसके अस्त-व्यस्त हुए बालों को कंधी कर धीरे-धीरे प्यार से सुलझाती व संवारती है। और जब माँ अपने बच्चे को अपने घुटनों के बीच पकड़ कर के कपड़े पहनाती है तो बच्चा कितने ही प्यार से अपनी माँ के चेहरे को देखता है। दीपावली की शाम को अपने साफ-सुथरे व् पुताई किये हुए या रंग रोगन किये हुए, सुन्दर सजे घर में माँ अपने बच्चे के लिए चीनी मिट्टी से बने खिलौने व जगमगाते हुए दिये लेकर आयी हैं। शाम को जब वह अपने पूरे घर में दिये जलाती हैं तो कुछ दिए बच्चे के द्वारा बनाए छोटे से मिट्टी के घर में भी जला देती है। छोटा बच्चा अपने आँगन में मचल रहा है और जिद कर रहा है। उस बच्चे का मन चाँद को देख कर ललचाया हुआ है और वह उस आकाश के चांद को पाने की जिद्द कर रहा है। बच्चे की इस जिद्द पर माँ बच्चे को एक आईना पकड़ा देती है। और फिर उस दर्पण में चाँद का प्रतिबिम्ब दिखाकर बच्चे को समझा देती है कि देखो, आकाश का चांद शीशे में उतर आया है। रक्षाबंधन की सुबह आनंद व मिठास की सौगात है। रक्षाबंधन के दिन सुबह के समय आकाश में हल्के-हल्के बादल छाए हुए हैं। और जिस तरह उन बादलों के बीच बिजली चमक रही हैं ठीक उसी तरह राखी के लच्छों भी चमक रहे हैं। और बहिन बड़े ही प्यार से उस चमकती राखी को अपने भाई की कलाई पर बांधती हैं।

 

रुबाइयाँ कविता की व्याख्या (Explanation)

 

काव्यांश 1
आंगन में लिए चांद के टुकड़े को खड़ी
हाथों पे झुलाती है उसे गोद-भरी
रह-रह के हवा में जो लोका देती है
गूँज उठती है खिलखिलाते बच्चे की हंसी।

 कठिन शब्द –
चाँद का टुकड़ा – बहुत प्यारा
गोद-भरी – गोद में भरकर, आँचल में लेकर
लोका देती हैं – उछाल देती है

 व्याख्याउपरोक्त पंक्तियों में कवि ने माँ के स्नेह का अद्धभुत वर्णन किया है। कवि कहते हैं कि एक माँ अपने घर के आंगन में अपने चांद के टुकड़े अर्थात  अपने छोटे से बच्चे को लेकर खड़ी है। कभी वह माँ अपने बच्चे को अपने हाथों पर झूला झूलती है तो कभी उसे प्यार से गोद में भर लेती है। कभी-कभी वह माँ उस बच्चे को हवा में उछाल भी लेती हैं। माँ के इस प्यार-दुलार भरे खेल से बच्चा भी बहुत खुश होता है और खिलखिला कर हंस देता है। उस छोटे से बच्चे की हंसी से वह पूरा घर और घर का आंगन गूँज उठता हैं।

काव्यांश 2 –
नहला के छलके-छलके निर्मल जल से
उलझे हुए गेसुओं में कंघी करके
किस प्यार से देखता है बच्चा मुंह को
जब घुटनियों में ले के हैं पिन्हाती कपड़े।

कठिन शब्द
छलके – हिलते-डुलते
निर्मल – स्वच्छ, साफ़
उलझे – अस्त-व्यस्त
गेसुओं – बालों
घुटनियों – घुटनों
पिन्हाती – पहनाती

 व्याख्याउपरोक्त पंक्तियों में कवि ने माँ द्वारा बच्चे के नहाने की प्रक्रिया का मनोहारी वर्णन किया गया है। कवि कहते हैं कि माँ अपने छोटे बच्चे को हिलते-डुलते साफ-सुथरे पानी से नहलाती है। नहाने से उसके अस्त-व्यस्त हुए बालों को कंधी कर धीरे-धीरे प्यार से सुलझाती व संवारती है। और जब माँ अपने बच्चे को अपने घुटनों के बीच पकड़ कर के कपड़े पहनाती है तो बच्चा कितने ही प्यार से अपनी माँ के चेहरे को देखता है। कहने का आशय यह है कि जिस प्यार से बच्चा अपनी माँ को निहारता है उसका शब्दों में वर्णन करना संभव नहीं है।

काव्यांश 3 –
दीपावली की शाम घर पुते और सजे
चीनी के खिलौने जगमगाते लावे
वो रूपवती मुखड़े पै इक नर्म दमक
बच्चे के घरौंदे में जलाती है दिए।

कठिन शब्द –
शाम – संध्या, सूर्यास्त का समय, दिन का अंत
पुते – साफ़-सुथरे, रैंगे
लावे – लाए
रूपवती – सुंदरी, खूबसूरत
मुखड़े – मुख, चेहरा
इक – एक
दमक – चमक
घरोंदे – मिट्टी के घर, छोटा घर, मिट्टी-रेत आदि का छोटा घर जिससे बच्चे खेलते हैं
दिए – दीपक

व्याख्या उपरोक्त पंक्तियों में कवि ने दीपावली की शाम में घर में बनने वाले वातावरण का सुंदर चित्रण किया+ है। कवि कहते हैं कि दीपावली की शाम को अपने साफ-सुथरे व् पुताई किये हुए या रंग रोगन किये हुए, सुन्दर सजे घर में माँ अपने बच्चे के लिए चीनी मिट्टी से बने खिलौने व जगमगाते हुए दिये लेकर आयी हैं। शाम को जब वह अपने पूरे घर में दिये जलाती हैं तो कुछ दिए बच्चे के द्वारा बनाए छोटे से मिट्टी के घर में भी जला देती है। और यह सब करते हुए माँ  का सुंदर चेहरा कोमलता व ममता की चमक से दमक उठता है। कहने का आशय है कि जब माँ अपने बच्चे के छोटे से घर में दिए जलाती है तो उसके सुंदर मुँह पर चमक आ जाती है।

 काव्यांश 4 –
आंगन में ठुनक रहा है जिदयाया है
बालक तो हई चाँद पर ललचाया है
दर्पण उसे दे के कह रही है मां
देख आईने में चांद उतर आया है।


कठिन शब्द –
ठुनक – मचलना, बनावटी रोना
जिदयाया – जिद के कारण मचला हुआ
हई – है ही
दर्पण – शीशा
आईने – दर्पण, शीशा

व्याख्या – उपरोक्त पंक्तियों में कवि बाल-हठ का मनोहारी वर्णन किया गया है। कवि कहते हैं कि छोटा बच्चा अपने आँगन में मचल रहा है और जिद कर रहा है। उस बच्चे का मन चाँद को देख कर ललचाया हुआ है और वह उस आकाश के चांद को पाने की जिद्द कर रहा है। बच्चे की इस जिद्द पर माँ बच्चे को एक आईना पकड़ा देती है। और फिर उस दर्पण में चाँद का प्रतिबिम्ब दिखाकर बच्चे को समझा देती है कि देखो, आकाश का चांद शीशे में उतर आया है। कहने का आशय यह है कि एक माँ अपने बच्चे की ख़ुशी के लिए उसकी हर जिद्द को किसी न किसी तरह पूरा कर ही देती है।


काव्यांश 5 –
रक्षाबंधन की सुबह रस की पुतली
छायी है घटा गगन की हल्की-हल्की
बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे
भाई के हैं बाँधती चमकती राखी।

 कठिन शब्द –
रस की पुतली – आनंद की सौगात, मीठा बंधन
घटा – बादल
गगन – आकाश
लच्छा – राखी के चमकदार लच्छा, हाथ या पैर में पहनने का पतली या हलकी ज़ंजीरों से बना गहना

 व्याख्या – उपरोक्त पंक्तियों में कवि रक्षाबंधन के त्यौहार व भाई-बहिन के असीम प्यार भरे पवित्र रिश्ते का वर्णन कर रहे है। कवि कहते हैं कि रक्षाबंधन की सुबह आनंद व मिठास की सौगात है। रक्षाबंधन के दिन सुबह के समय आकाश में हल्के-हल्के बादल छाए हुए हैं। और जिस तरह उन बादलों के बीच बिजली चमक रही हैं ठीक उसी तरह राखी के लच्छों भी चमक रहे हैं। और बहिन बड़े ही प्यार से उस चमकती राखी को अपने भाई की कलाई पर बांधती हैं।

 

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